रणनीतिक साझेदारी और 2030 का बड़ा लक्ष्य
भारत और वियतनाम ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को 'Enhanced Comprehensive Strategic Partnership' के स्तर तक पहुंचा दिया है। इस नई साझेदारी के तहत, दोनों देश 2030 तक व्यापार को $25 अरब तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। यह मौजूदा $16 अरब से अधिक के व्यापार (जो मार्च 2026 में समाप्त हुए पिछले वित्त वर्ष में हुआ था) से काफी बड़ा उछाल होगा। इस लक्ष्य को हासिल करने में 'क्रिटिकल मिनरल्स', दुर्लभ पृथ्वी तत्व (rare earths) और ऊर्जा सहयोग मुख्य भूमिका निभाएंगे। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करना और आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply chains) को अधिक लचीला बनाना है, जो भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति का एक अहम हिस्सा है।
वियतनाम की खनिज संपदा और भारत की योजनाएं
वियतनाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी तत्व (rare earth elements) भंडार वाला देश है, जो चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। इसी वजह से, कई देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वियतनाम की ओर देख रहे हैं। भारत भी इसमें पीछे नहीं है। जनवरी 2025 में लॉन्च किए गए भारत के 'National Critical Minerals Mission' का लक्ष्य घरेलू अन्वेषण (exploration) और प्रसंस्करण (processing) को बढ़ावा देना है, साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण खनिज समझौतों की तलाश करना भी है। भारत 'Minerals Security Partnership' (MSP) का भी सदस्य है, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं, जो एक सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला बनाने के भारत के लक्ष्य को दर्शाता है। वियतनाम के साथ खनिजों के क्षेत्र में यह सहयोग एक रणनीतिक मेल है, जो वियतनाम के संसाधनों को भारत की मांग और प्रसंस्करण क्षमता से जोड़ता है।
आगे की राह में चुनौतियां
हालांकि, इस साझेदारी में कई चुनौतियां भी हैं। वियतनाम के 'क्रिटिकल मिनरल्स' सेक्टर में लॉजिस्टिक्स की समस्या, प्रोसेसिंग तकनीक की कमी और मूल्यवर्धन (value addition) के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता जैसी बाधाएं मौजूद हैं। भारी भंडार होने के बावजूद, वियतनाम उन्नत रिफाइनिंग के लिए चीन पर निर्भर है, जिस पर यह साझेदारी अंकुश लगाना चाहती है। भारत को भी आसियान (ASEAN) देशों, जैसे वियतनाम, के साथ ऐतिहासिक व्यापार घाटे (trade deficit) का सामना करना पड़ता है, जिसे सावधानी से प्रबंधित करने की आवश्यकता होगी। $25 अरब के लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर प्रयास और नीतियों में तालमेल जरूरी है। अतीत के व्यापार समझौतों, जैसे AITIGA (ASEAN-India Trade in Goods Agreement), की आलोचना हुई है क्योंकि उन्होंने आसियान के निर्यात को भारत की ओर अधिक पक्षपात किया था। भू-राजनीतिक दबाव और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से प्रतिस्पर्धा भी भारत की वियतनाम के खनिज आउटपुट तक पहुंच को सीमित कर सकती है।
दीर्घकालिक विजन और प्रभाव
यह 'Enhanced Comprehensive Strategic Partnership' डिजिटल तकनीक, फार्मास्यूटिकल्स और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में गहरे सहयोग के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है, जो 'क्रिटिकल मिनरल्स' पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ चलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गठबंधन व्यापार लक्ष्य को तेजी से हासिल करने और इंडो-पैसिफिक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण को गति देगा। 'क्रिटिकल मिनरल्स' पर ध्यान केंद्रित करना आपसी समृद्धि और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण का संकेत देता है, जो लचीला आपूर्ति श्रृंखलाएं बना सकता है और क्षेत्रीय आर्थिक व भू-राजनीतिक संतुलन को नया आकार दे सकता है।
