नीति आयोग ने भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के क्षेत्र में एक बड़े सुधार की वकालत की है। संस्था ने देश के कुल R&D खर्च को अगले 5 सालों के भीतर GDP के 2% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में R&D पर होने वाला खर्च पिछले कई सालों से GDP के 0.64% के आसपास ही अटका हुआ है। नीति आयोग की रिपोर्ट, जिसका नाम 'Ease of Doing Research & Development in India - Removing Obstacles, Promoting Enablers' है, देश की R&D स्थिति का गहन विश्लेषण करती है।
क्यों है R&D खर्च कम? मुख्य चुनौतियां
दुनिया के दूसरे बड़े देशों की तुलना में भारत का R&D पर GDP के प्रतिशत के रूप में खर्च काफी कम है। जहाँ भारत GDP का करीब 0.64-0.66% खर्च करता है, वहीं चीन 2.4%, अमेरिका 3.5% और दक्षिण कोरिया 4.9% से अधिक खर्च करता है। वैश्विक औसत लगभग 1.18% है। भारत में यह आंकड़ा सालों से 0.6% से 0.7% के बीच ही रहा है।
इस बड़े अंतर का एक मुख्य कारण प्राइवेट सेक्टर की बेहद कम भागीदारी है। विकसित देशों में R&D खर्च का 70% से अधिक हिस्सा प्राइवेट सेक्टर वहन करता है, जबकि भारत में यह आंकड़ा केवल 36-41% है। इसके अलावा, फंड के आवंटन और उपयोग में भी कई तरह की अक्षमताएं हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले एक फाइनेंशियल ईयर में आवंटित R&D फंड का केवल 60% ही इस्तेमाल हो पाया। सरकारी लालफीताशाही, जटिल आवेदन प्रक्रियाएं और कठोर वित्तीय नियम रिसर्च ग्रांट के प्रभावी उपयोग में बाधा डालते हैं, जिससे देरी होती है और फंड का सही उपयोग नहीं हो पाता।
नवाचार (Innovation) में बाधाएं
रिसर्च पब्लिकेशन और नवाचार रैंकिंग में तरक्की के बावजूद, भारत के R&D इकोसिस्टम में ऐसी कई संरचनात्मक कमजोरियां हैं जो इसकी दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती हैं। एक बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण की होनहार रिसर्च को व्यावसायिक रूप से सफल प्रोडक्ट्स में बदलना मुश्किल होता है। यूनिवर्सिटीज और कंपनियों के बीच कमजोर कड़ियां और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) संरक्षण के मुद्दे इन प्रयोगशाला की सफलताओं को बाजार तक पहुंचाने में बाधा डालते हैं।
भारत में युवा प्रतिभाओं की बड़ी संख्या है, लेकिन प्रति दस लाख लोगों पर शोधकर्ताओं की संख्या अन्य प्रमुख देशों की तुलना में कम है। R&D फंडिंग सिस्टम भी असमान है, जिसमें अधिकांश फंड कुछ शीर्ष संस्थानों को मिलते हैं, जिससे राज्य विश्वविद्यालयों के पास कम संसाधन बचते हैं। यह असंतुलन, फंड जारी करने में देरी और लचीले संस्थागत ढांचे की कमी के साथ मिलकर नवाचार को बाधित कर सकता है।
सुझाए गए समाधान और आगे की राह
इन चुनौतियों से निपटने के लिए नीति आयोग की रिपोर्ट एक व्यापक रणनीति पेश करती है। प्रमुख सिफारिशों में R&D खरीद पर 5% का गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) बहाल करना और प्राइवेट सेक्टर के निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नए वित्तीय प्रोत्साहन (Fiscal Incentives) शुरू करना शामिल है। रिपोर्ट कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड के बेहतर उपयोग और R&D में व्यक्तिगत योगदान के लिए उच्च टैक्स डिडक्शन की भी सिफारिश करती है। R&D योजनाओं के बेहतर समन्वय के लिए एक अंतर-विभागीय समिति (Inter-departmental Committee) का गठन और संभवतः कंपनी अधिनियम (Companies Act) के तहत एक समर्पित R&D व्यय रिपोर्टिंग श्रेणी (Dedicated R&D Expenditure Reporting Category) जोड़ने का भी प्रस्ताव है।
यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो ये प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को काफी बढ़ा सकते हैं, फंड के उपयोग में सुधार कर सकते हैं और रिसर्च से अधिक ठोस आर्थिक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, सफलता गहरी जड़ें जमा चुकी प्रशासनिक अकुशलताओं से निपटने और अधिक चुस्त, परिणाम-केंद्रित शोध वातावरण को बढ़ावा देने पर निर्भर करेगी। 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के भारत के लक्ष्य के लिए उसकी R&D क्षमताओं में सुधार और निवेश व क्रियान्वयन (Execution) के बीच के अंतर को पाटना महत्वपूर्ण है।