डायरेक्ट टैक्स (Direct Tax) में राहत और टैक्सपेयर (Taxpayer) को ज़्यादा अधिकार
नए फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) की शुरुआत, यानी 1 अप्रैल 2026 से, इंडिया के डायरेक्ट टैक्स (Direct Tax) सिस्टम में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। इनकम टैक्स एक्ट, 2025 (Income Tax Act, 2025) लागू होने वाला है, जिसका मकसद टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन (Tax Administration) को मॉडर्न बनाना और अनुपालन करने वाले टैक्सपेयर्स (Taxpayers) के लिए एक भरोसेमंद सिस्टम तैयार करना है।
अब टैक्सपेयर्स (Taxpayers) को रिवाइज्ड रिटर्न (Revised Return) फाइल करने के लिए असेसमेंट ईयर (Assessment Year) खत्म होने के 12 महीने तक का समय मिलेगा। साथ ही, अपडेटेड रिटर्न (Updated Return) भी फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) खत्म होने के 4 साल बाद तक फाइल किए जा सकेंगे।
सेक्शन 440 के तहत मिलने वाली इम्युनिटी (Immunity) का दायरा बढ़ाया गया है। अगर टैक्सपेयर (Taxpayer) पेनाल्टी (Penalty) के बराबर अतिरिक्त इनकम टैक्स (Income Tax) भर देता है, तो उसे ज़्यादा मामलों में राहत मिल सकती है।
डिस्प्यूट (Dispute) सुलझाने के रास्ते भी आसान हो रहे हैं। ऑफेंस (Offense) को कंपाउंड (Compound) करने जैसे तरीकों से टैक्स वायलेशन (Tax Violation) के मामलों में लंबा केस चलने के बजाय जल्दी समाधान मिल सकता है। सेक्शन 148 के तहत होने वाली री-असेसमेंट (Re-assessment) की प्रक्रिया को भी ज़्यादा फेयर बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि छुपी हुई इनकम (Escaped Income) का पता लगाने में डिपार्टमेंट (Department) की क्षमता बनी रहे।
इसके अलावा, मिनिमम अल्टरनेट टैक्स (Minimum Alternate Tax - MAT) की दर को घटाकर 14% कर दिया गया है। 1 अप्रैल 2026 से MAT क्रेडिट (MAT Credit) का एक्युमुलेशन (Accumulation) भी बंद हो जाएगा, जो कॉर्पोरेट टैक्स (Corporate Tax) को और सरल बनाने की ओर एक कदम है।
GST रिफंड (GST Refund) से बिज़नेस की लिक्विडिटी (Liquidity) को बूस्ट
वहीं, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (Goods and Services Tax - GST) के मोर्चे पर भी सरकार बड़े कदम उठाने की तैयारी में है। उम्मीद है कि बजट के बाद मार्च के आखिर या अप्रैल 2026 की शुरुआत में GST काउंसिल (GST Council) की मीटिंग होगी।
इस मीटिंग का मुख्य फोकस रजिस्ट्रेशन (Registration), रिफंड (Refund) और ऑडिट (Audit) प्रक्रियाओं को और सिम्पलीफाई (Simplify) करना होगा। टैक्स एक्सपर्ट्स (Tax Experts) और इंडस्ट्री बॉडीज़ (Industry Bodies) लंबे समय से GST रिफंड (GST Refund) में हो रही देरी की ओर इशारा कर रही हैं। यह देरी खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) और एक्सपोर्टर्स (Exporters) के वर्किंग कैपिटल (Working Capital) को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। इन देरी के कारण बिज़नेस असल में सिस्टम को अनचाहे ही लोन (Loan) दे रहे हैं, जिससे उनकी फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) और कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) पर बुरा असर पड़ रहा है।
इंडस्ट्री चाहते हैं कि इनपुट सर्विसेज (Input Services) पर जमा हुए इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit - ITC) के रिफंड (Refund) की इजाज़त मिले, ताकि बिज़नेस की लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ सके। Finance Bill 2026 में रिफंड प्रोविजन्स (Refund Provisions) को लिबरलाइज़ (Liberalize) करने के उपाय प्रस्तावित किए गए हैं, जैसे इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (Inverted Duty Structure) के लिए प्रोविज़नल रिफंड (Provisional Refund) और एक्सपोर्ट रिफंड (Export Refund) के लिए मिनिमम थ्रेशोल्ड (Minimum Threshold) को हटाना। यह उन बिज़नेस के लिए बहुत ज़रूरी है जो कम मार्जिन (Margin) पर काम कर रहे हैं।
इकोनॉमी (Economy) और बाज़ार (Market) पर नज़र
यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब इंडियन इकोनॉमी (Indian Economy) के मज़बूत रहने की उम्मीद है। इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) के मुताबिक, FY26-27 के लिए GDP ग्रोथ 6.8% से 7.2% के बीच रहने का अनुमान है, जिसमें डोमेस्टिक डिमांड (Domestic Demand) और पब्लिक इन्वेस्टमेंट (Public Investment) का बड़ा हाथ होगा। इन टैक्स रिफॉर्म्स (Tax Reforms) का मकसद इकोनॉमी की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) को बढ़ाना और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) को बढ़ावा देना है।
ऐतिहासिक तौर पर, टैक्स पॉलिसी (Tax Policy) में बदलावों पर बाज़ार (Market) का रिएक्शन मिला-जुला रहा है। बजट घोषणाओं से थोड़ी वोलेटिलिटी (Volatility) आ सकती है, लेकिन लंबी अवधि में स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (Structural Reforms) और उनके एग्जीक्यूशन (Execution) का असर ज़्यादा मायने रखता है। टैक्स एक्सपर्ट्स (Tax Experts) का मानना है कि इन रिफॉर्म्स की सफलता एडमिनिस्ट्रेटिव सेंसिटिविटी (Administrative Sensitivity) और प्रभावी एग्जीक्यूशन (Effective Execution) पर निर्भर करेगी, खासकर GST रिफंड (GST Refund) के मामले को सुलझाने में। तभी 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' (Ease of Doing Business) का मकसद पूरा होगा और टैक्सपेयर्स (Taxpayers) का भरोसा बढ़ेगा।