हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति की व्यापक टैरिफ (Tariff) लगाने की शक्ति को लेकर एक फैसला सुनाया, जिसे शुरुआत में राहत के तौर पर देखा गया था। लेकिन, इसने अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) में चल रही अनिश्चितता को और उजागर कर दिया है। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा तुरंत नए शुल्क (Levies) लागू करने और फिर उनमें तेजी से बदलाव करने की घोषणाओं ने भारतीय निर्यातकों के बीच काफी बेचैनी पैदा कर दी है।
इस बीच, भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम ट्रेड डील (Interim Trade Deal) को अंतिम रूप देने के लिए तय की गई बातचीत भी टल गई है। दोनों देश इन टैरिफ (Tariff) के घटनाक्रमों और कानूनी चुनौतियों के निहितार्थों का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं। यह देरी एक स्थिर ट्रेड फ्रेमवर्क को मजबूत करने के प्रयासों में ठहराव का संकेत देती है, जिससे बाजार तक पहुंच (Market Access) में सुधार और निवेशक के विश्वास (Investor Confidence) पर असर पड़ सकता है। द्विपक्षीय व्यापार, जो 2024-25 फाइनेंशियल ईयर में लगभग USD 186 बिलियन का था, इस अनिश्चितता की वजह से प्रभावित हो रहा है।
भारतीय निर्यातकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अनुमान लगाने की क्षमता का कम होना है, जो ऐसे सेक्टरों के लिए महत्वपूर्ण है जिनमें लंबे प्रोडक्ट डेवलपमेंट साइकिल और मार्जिन (Margins) टाइट होते हैं। उदाहरण के लिए, फुटवियर और लेदर इंडस्ट्री को अमेरिकी ब्रांडों के साथ प्रतिस्पर्धा बनाए रखने और सप्लायर संबंधों को निभाने के लिए स्थिर 'लैंडेड कॉस्ट' (Landed Cost) की आवश्यकता होती है। इसी तरह, समुद्री भोजन (Seafood) सेक्टर, जिसका एक बड़ा हिस्सा ($2.68 बिलियन FY25 में) अमेरिका को निर्यात होता है, मूल्य प्रतिस्पर्धा (Price Competition) के बढ़े हुए दबाव का सामना कर रहा है। भारतीय झींगा (Shrimp) निर्यात, टैरिफ के दबाव के कारण इक्वाडोर, वियतनाम और इंडोनेशिया की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो रहा है, भले ही भारत को समुद्री भोजन शिपमेंट के लिए अमेरिकी मंजूरी मिल गई हो। टेक्सटाइल, अपैरल (Apparel) और जेम्स एंड ज्वेलरी (Gems & Jewellery) जैसे क्षेत्र, जो अमेरिकी मांग पर बहुत अधिक निर्भर हैं और लाखों लोगों को रोजगार देते हैं, वे भी कमजोर स्थिति में हैं। इन श्रम-गहन उद्योगों को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों के प्रतिस्पर्धियों से बाजार हिस्सेदारी खोने का बड़ा जोखिम है।
इस लगातार बदलती टैरिफ नीति के कारण भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर भी असर पड़ने की आशंका है। कुछ अनुमानों के अनुसार, यह 2026 तक 90 INR प्रति USD तक कमजोर हो सकता है। बढ़ते चालू खाता घाटे (Current Account Deficit), जो GDP का 1.5% रहने का अनुमान है, भी रुपये की अस्थिरता को बढ़ाता है। इसके अलावा, ऐसी नीतिगत अनिश्चितता व्यापक आर्थिक भावना (Economic Sentiment) को भी प्रभावित करती है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) ने इस अनिश्चितता पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि हाल के ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) से अवसर तो मिल सकते हैं, लेकिन नीतिगत स्थिरता (Policy Consistency) की मूल समस्या भारतीय निर्यात की गति और दीर्घकालिक निवेश (Long-term Investment) को बनाए रखने के लिए एक चिंता का विषय बनी हुई है। आगे बढ़ते हुए, भारत की रणनीति को तत्काल व्यापार वार्ता को दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों के साथ संतुलित करना होगा। निर्यात क्षेत्र की मजबूती, जो अप्रैल-जनवरी 2025-26 में 6.15% की वृद्धि से प्रदर्शित हुई है, अंतर्निहित ताकत का संकेत देती है, लेकिन किसी भी एक व्यापारिक भागीदार पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए उभरते बाजारों में विविधीकरण (Diversification) महत्वपूर्ण बना हुआ है।