भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड सरप्लस में भारी गिरावट आई है। मई 2026 में यह **40%** से ज़्यादा घटकर **$2.94 बिलियन** रह गया, जो पिछले साल **$5.02 बिलियन** था। दोनों देशों के बीच हाई-लेवल ट्रेड टॉक शुरू हो गई है, जिस पर निवेशकों की नज़र है।
क्या है मामला?
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड को लेकर बातचीत का दौर शुरू हो गया है। कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल अमेरिका के ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमिसन ग्रीर से मुलाकात कर रहे हैं। दो दिन की इस चर्चा का मकसद अगले महीने तक एक नई ट्रेड डील पर सहमति बनाना है। इससे पहले फरवरी 2025 में पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच भी हाई-लेवल बातचीत हुई थी। इस समय बाजार की नजरें ट्रेड बैलेंस में आ रहे बदलावों पर हैं, क्योंकि पिछले एक साल में भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस काफी कम हुआ है।
ट्रेड सरप्लस में आई बड़ी गिरावट
कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 में भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस 40% से ज़्यादा गिर गया। इस महीने सरप्लस $2.94 बिलियन रहा, जबकि मई 2025 में यह $5.02 बिलियन था। इस कमी का मतलब है कि अमेरिका से आयात (Imports) निर्यात (Exports) की तुलना में तेज़ी से बढ़ रहा है, या फिर निर्यात धीमा हो गया है, जिसका असर उन इंडस्ट्रीज़ पर पड़ सकता है जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं।
इन सेक्टर्स पर पड़ रहा है असर
ट्रेड डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ खास सेक्टरों में ट्रेड की चाल बदल रही है। उदाहरण के लिए, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के मामले में, मार्च 2026 में भारत का अमेरिका को एक्सपोर्ट 24% से ज़्यादा गिरा, वहीं अमेरिका से इंपोर्ट 130% से ज़्यादा बढ़ गया। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स सेक्टर में भी एक्सपोर्ट 33.41% घटा, जबकि इंपोर्ट 136.30% बढ़ा। कॉपर प्रोडक्ट्स, ऑर्गेनिक केमिकल्स और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में भी एक्सपोर्ट घटने और इंपोर्ट बढ़ने का पैटर्न देखने को मिल रहा है।
रेगुलेटरी और ट्रेड रिस्क
ये ट्रेड टॉक ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका सेक्शन 301 इन्वेस्टिगेशन के तहत नई टैरिफ स्ट्रक्चर पर विचार कर रहा है, जिसका असर कई भारतीय इंडस्ट्रीज़ पर पड़ सकता है। एग्रीकल्चर यानी खेती-किसानी का मुद्दा भी इन बातचीत में काफी अहम है। अमेरिकी फार्म ग्रुप्स ने अपनी सरकार से वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) में अपनी स्थिति बनाए रखने की अपील की है, खासकर फार्म इंपोर्ट्स को लेकर। इसके अलावा, अमेरिकी एग्रीकल्चर सब्सिडीज़ (Farm Bill के तहत) को लेकर भी चिंताएं हैं, जो कॉटन, सोयाबीन और रबर जैसे सेक्टर्स में भारतीय किसानों के लिए कॉम्पिटिशन खड़ा कर सकती हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
निवेशक इन ट्रेड वार्ताओं की प्रगति पर नज़र रख सकते हैं, खासकर टैरिफ स्ट्रक्चर या पॉलिसी में किसी भी बदलाव की खबर पर, जो एक्सपोर्ट-हैवी सेक्टर्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोलियम को प्रभावित कर सकती है। एग्रीकल्चरल गुड्स के मिनिमम इंपोर्ट प्राइस (MIP) में संभावित बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में कंपनियों के फाइलिंग्स और सरकारी नीतियों से यह समझने में मदद मिलेगी कि ये ट्रेड डायनामिक्स इन सेक्टर्स की कंपनियों के रेवेन्यू और मार्जिन पर क्या असर डाल रहे हैं।
