टैरिफ में बराबरी का पेंच
दोनों देशों के बीच मौजूदा बातचीत में सबसे बड़ा रोड़ा टैरिफ (Tariff) और मार्केट एक्सेस (Market Access) को लेकर है। भारत चाहता है कि अमेरिका उसे उन क्षेत्रीय देशों के बराबर ही टैरिफ रियायतें दे, जिन्हें वह पहले से दे रहा है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगा हो जाएगा और डील का कोई मतलब नहीं रहेगा। भारत अपने एक्सपोर्ट्स (Exports) को भविष्य में लगने वाले टैरिफ (Tariff) hikes से बचाना चाहता है, क्योंकि अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) में लगातार बदलाव देखने को मिले हैं।
इंडस्ट्रियल ओवरकैपेसिटी और रेगुलेटरी टकराव
सिर्फ टैरिफ के प्रतिशत से ज्यादा, अमेरिका भारत की इंडस्ट्रियल प्रैक्टिस (Industrial Practices) पर भी नजर रख रहा है। खासकर, जबरन मजदूरी (Forced Labor) के आरोप और सेक्टर-स्पेसिफिक ओवरकैपेसिटी (Overcapacity) बड़े मुद्दे हैं। 'सेक्शन 301' के तहत चल रही ये जांचें अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (Trade Representative) के लिए एक बड़ा हथियार हैं। भारतीय टेक्सटाइल (Textile) और मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) सेक्टर के लिए ये जांचें एक्सपोर्ट वॉल्यूम (Export Volume) के लिए बड़ा खतरा हैं। भारत ने इन जांचों को खत्म करने को ट्रेड डील (Trade Deal) फाइनल करने की शर्त रखा है, जिससे साफ है कि भारत अपनी औद्योगिक स्वायत्तता (Industrial Autonomy) पर कोई समझौता नहीं करेगा।
इंस्टीट्यूशनल अड़चनों का खतरा
जोखिम की बात करें तो, जुलाई के मध्य की डेडलाइन (Deadline) काफी महत्वाकांक्षी लग रही है। दोनों देशों के बीच पिछली ट्रेड नेगोशिएशन्स (Trade Negotiations) में अक्सर अमेरिका के घरेलू दबाव और कानूनी व्याख्याओं के कारण रुकावटें आई हैं। टैरिफ लागू होने को लेकर अनिश्चितता, खासकर पिछले न्यायिक हस्तक्षेपों के बाद, मल्टीनेशनल कंपनियों (Multinational Corporations) के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है। इसके अलावा, लेबर प्रैक्टिस (Labor Practices) पर लगातार फोकस का मतलब है कि फाइनल डील में कड़े कंप्लायंस मॉनिटरिंग (Compliance Monitoring) नियम हो सकते हैं, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स (Exporters) के मार्जिन (Margin) पर दबाव आ सकता है। भारत के टेक्सटाइल इंडस्ट्री के कुछ हिस्से इन रेगुलेटरी बदलावों के प्रति संवेदनशील हैं, जो उन्हें हाई-कॉस्ट प्रोडक्शन (High-Cost Production) की ओर धकेल सकते हैं और शॉर्ट-टर्म ग्रोथ (Short-Term Growth) को प्रभावित कर सकते हैं।
