अंतरिम समझौते का दोहरा पहलू
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए इस अंतरिम व्यापार समझौते का मुख्य उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे टैरिफ विवादों को सुलझाना है। इसके तहत, भारत अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ को खत्म या कम करेगा। वहीं, अमेरिका भारतीय मूल के सामानों पर 18% का जवाबी टैरिफ (tariff) लगाएगा, जो पहले 50% तक था। यह कदम भारतीय निर्यातकों, विशेषकर टेक्सटाइल, परिधान और कुछ मशीनरी क्षेत्रों के लिए प्रतिस्पर्द्धा को बहाल करेगा। इस डील में यह भी शामिल है कि भारत अगले 5 सालों में अमेरिका से $500 अरब के ऊर्जा उत्पाद, विमान और अन्य सामान खरीदेगा। यह आंकड़ा भारत द्वारा 2024-25 फाइनेंशियल ईयर में अमेरिका से कुल $45.6 अरब के सामानों के आयात से कहीं ज्यादा है। आपको बता दें कि 2024 में अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा $45.8 अरब था, जो पिछले साल से 5.9% बढ़ा है।
कोकिंग कोल की निर्भरता बनाम आत्मनिर्भरता
इस समझौते का एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय कोकिंग कोल (coking coal) का आयात है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में भारत का कोकिंग कोल आयात 6% बढ़कर 57.89 मिलियन टन हो गया था, जिसमें ऑस्ट्रेलिया सबसे बड़ा सप्लायर रहा। वहीं, अमेरिका इस महत्वपूर्ण औद्योगिक इनपुट का एक बढ़ता हुआ सप्लायर बन रहा है, जिसके शिपमेंट FY'24 में 18% बढ़कर 8.39 मिलियन टन तक पहुंच गए। इसका एक कारण यह भी है कि चीन में ऑस्ट्रेलियाई कोयले की मांग फिर से बढ़ने पर अमेरिकी उत्पादक भारत की ओर रुख कर रहे हैं। भारत ने कोयला और खनिज अधिनियम के तहत कोकिंग कोल को एक महत्वपूर्ण सामग्री (critical material) घोषित किया था, जिसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना था। लेकिन अब यह ट्रेड डील भारत पर अमेरिकी स्रोतों को प्राथमिकता देने का दबाव बना सकती है।
कृषि रियायतें और किसानों की आजीविका
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भले ही यह दावा किया हो कि मांस, डेयरी, चावल और गेहूं जैसे संवेदनशील कृषि क्षेत्र इस डील से बाहर हैं और किसानों के हितों की रक्षा की जाएगी, लेकिन कुछ खास रियायतें दी गई हैं। भारत सूखे डिस्टिल्ड ग्रेन्स (DDGS), पशु आहार के लिए रेड सॉरघम (red sorghum), ट्री नट्स (tree nuts), ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल और शराब जैसे अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करेगा। इससे किसान संगठनों में चिंताएं बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि इससे घरेलू फसलों, जैसे मक्का और सोयाबीन (जो पशु आहार में इस्तेमाल होते हैं), की कीमतों में गिरावट आ सकती है। भारत में छोटे किसानों की संख्या अधिक होने के कारण, भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी कृषि निर्यात से मुकाबला करना मुश्किल है। किसान समूहों ने इस डील को "संपूर्ण आत्मसमर्पण" बताया है और देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है, जो इन क्षेत्रों की राजनीतिक संवेदनशीलता को दर्शाता है।
विश्लेषकों की नजर में डील
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत-अमेरिका का यह अंतरिम व्यापार समझौता, जो तत्काल टैरिफ से राहत दे रहा है, वास्तव में "हानि कम करने का एक उपकरण" (harm reduction tool) है। यह मुख्य रूप से अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए है, न कि आपसी विकास को बढ़ावा देने के लिए। यह तर्क दिया जा रहा है कि भारत ने ऐसी रियायतें दी हैं जो 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) के आत्मनिर्भरता के दीर्घकालिक विजन को बाधित कर सकती हैं। समझौते की संरचना, जिसमें भारत की ओर से महत्वपूर्ण आयात प्रतिबद्धताएं हैं, लेकिन अमेरिका की ओर से वैसी ही आयात बढ़ाने की कोई पारस्परिक प्रतिबद्धता नहीं है, दोनों देशों के बीच आर्थिक आकार के बड़े अंतर को देखते हुए इसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। भारत का अमेरिका के साथ ऐतिहासिक व्यापार अधिशेष (trade surplus) नई रूपरेखा से प्रभावित हो सकता है, भले ही 2026-27 तक द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर $300 अरब होने का अनुमान है।
संभावित जोखिम और आलोचना
यह अंतरिम समझौता कई जोखिमों से भरा है जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को कमजोर कर सकते हैं। अमेरिकी औद्योगिक और कृषि वस्तुओं की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ कम करने की प्रतिबद्धता, जिसमें वे वस्तुएं भी शामिल हैं जो सोयाबीन और मक्का जैसी घरेलू उपज के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं, स्वदेशी उत्पादन को मजबूत करने के घोषित लक्ष्य के विपरीत है। अमेरिकी कोकिंग कोल निर्यात का भारत की ओर पुनः दिशा, जो स्टील उत्पादन के लिए फायदेमंद हो सकता है, सीधे तौर पर सरकार के इस महत्वपूर्ण संसाधन पर आयात निर्भरता को कम करने के हालिया प्रयासों को चुनौती देता है। इसके अलावा, रूसी तेल आयात पर भारत की प्रतिबद्धता के बारे में अनिश्चितता, जिस पर अमेरिकी वार्ताकारों ने जोर दिया था लेकिन संयुक्त बयान में इसका उल्लेख नहीं था, मतभेदों को उजागर करता है जो भविष्य में टकराव का संकेत दे सकते हैं। कुछ विश्लेषणों के अनुसार, यह सौदा भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कमी ला सकता है, और इसे "असमान और अनुचित" व्यवस्था बताया गया है।
भविष्य का दृष्टिकोण
इन अंतर्निहित चिंताओं के बावजूद, मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) के विश्लेषकों का भारत पर एक मजबूत भरोसा बना हुआ है। वे 2026 तक भारत को सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने का अनुमान लगा रहे हैं, जिसका समर्थन मजबूत घरेलू मौलिक सिद्धांतों और नीतिगत सुधारों से होगा। टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं का समाधान भारतीय इक्विटी (equities) को बढ़ावा देगा, जैसा कि ICICI डायरेक्ट जैसी फर्मों का अनुमान है। हालांकि, इस सकारात्मक भावना पर अमेरिकी नीतिगत बदलावों से उत्पन्न होने वाली व्यापार-संबंधी अनिश्चितताएं वैश्विक आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती हैं। व्यापक भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर बातचीत जारी रहेगी, जिसका लक्ष्य आगे बाजार पहुंच और आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन बढ़ाना है, लेकिन वर्तमान ढांचा एक जटिल मिसाल कायम करता है।