India-US Trade Deal: सरप्लस की बम्पर उम्मीद, पर अमेरिकी शर्तों का डर!

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India-US Trade Deal: सरप्लस की बम्पर उम्मीद, पर अमेरिकी शर्तों का डर!
Overview

भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते से भारत का एक्सपोर्ट सरप्लस (Export Surplus) बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन **$500 अरब** के बड़े इंपोर्ट (Import) वादे और अमेरिकी टैरिफ (Tariff) को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

सरप्लस का बड़ा उछाल, पर शर्तें हैं भारी?

इस नए ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) का सबसे बड़ा पहलू यह है कि भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस (Trade Surplus) ज़बरदस्त तरीके से बढ़ने वाला है। SBI की रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सरप्लस सालाना $90 अरब से भी ऊपर जा सकता है। पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 2025 में यह लगभग $40.8 अरब था।

'मैनेज्ड एक्सेस' और असमान टैरिफ की मार

हालांकि, इस डील में एक बड़ा पेच है। अमेरिका ने भारतीय इम्पोर्ट्स, खासकर टेक्सटाइल, गारमेंट्स और मशीनरी पर 18% तक के टैरिफ (Tariff) बरकरार रखे हैं, जबकि भारत ने अमेरिका के इंडस्ट्रियल और एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स पर अपने टैरिफ पूरी तरह खत्म कर दिए हैं। इस "मैनेज्ड एक्सेस" (Managed Access) फ्रेमवर्क से अमेरिका को अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा मिली हुई है, और विश्लेषकों का मानना है कि इससे वाशिंगटन का दबदबा बना रहेगा।

$500 अरब के इंपोर्ट वादे पर इकोनॉमिस्ट्स की शंका

इसके साथ ही, भारत ने अगले पांच सालों में अमेरिका से $500 अरब के गुड्स (Goods) खरीदने का वादा किया है। यह मौजूदा स्तरों से दोगुना यानी करीब $100 अरब सालाना इंपोर्ट (Import) के बराबर है। लेकिन इकोनॉमिस्ट्स (Economists) इस वादे की हकीकत पर सवाल उठा रहे हैं, इसे 'महत्वाकांक्षी' बता रहे हैं। उनका मानना है कि यह भारत की करेंसी और ट्रेड बैलेंस पर दबाव डाल सकता है, और इसकी व्यावहारिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

GSP का हटना और 'इंटरिम' डील का मतलब

मौजूदा ट्रेड इम्बैलेंस (Trade Imbalance) को देखते हुए, जहां अमेरिका भारत के कुल एक्सपोर्ट का करीब 20% लेता है लेकिन भारत अमेरिका से केवल 7% इंपोर्ट करता है, यह डील एक बड़ा रीकैलिब्रेशन (Recalibration) लाने की कोशिश है। लेकिन टैरिफ की असमानता और बड़े इंपोर्ट वादे पर चिंताएं हैं। बता दें कि अमेरिका ने 2019 में भारत का GSP स्टेटस भी खत्म कर दिया था, जो अब तक बहाल नहीं हुआ है। इस डील को एक 'इंटरिम' (Interim) फ्रेमवर्क कहा जा रहा है, जिसका मतलब है कि आगे इसमें बदलाव की गुंजाइश है, और अगर इंपोर्ट टारगेट पूरे नहीं हुए तो अमेरिका और मांग कर सकता है।

भविष्य के लक्ष्य और डायवर्सिफिकेशन

विश्लेषकों का कहना है कि भारत-अमेरिका के बीच कुल ट्रेड 2026-27 तक $300 अरब और 2030 तक $500 अरब सालाना तक पहुंचने का लक्ष्य है। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के अनुसार, इंपोर्ट बढ़ने से करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) 2026 में बढ़कर $37 अरब तक पहुंच सकता है। हालांकि, भारतीय एक्सपोर्टर्स ने मार्केट्स को डायवर्सिफाई (Diversify) करना जारी रखा है, खासकर वेस्ट एशिया, बाकी एशिया और उभरते बाजारों की ओर। सर्विसेज सेक्टर (Services Sector) का मजबूत सरप्लस (Surplus) कुछ हद तक मर्चेंडाइज ट्रेड (Merchandise Trade) के दबाव को कम कर सकता है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.