India-US Trade Deal: भारत के लिए 'बेस्ट डील'? 18% कम टैरिफ पर एक्सपोर्ट को मिलेगी रफ्तार

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AuthorMehul Desai|Published at:
India-US Trade Deal: भारत के लिए 'बेस्ट डील'? 18% कम टैरिफ पर एक्सपोर्ट को मिलेगी रफ्तार
Overview

भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा व्यापार समझौता फाइनल हो गया है। इस नए सौदे के तहत, भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ को **18%** तक कम कर दिया जाएगा, जिससे देश के एक्सपोर्ट (Export) को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

"बेस्ट डील" पर सरकारी दावों का दम

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस हालिया इंडिया-यूएस (India-US) व्यापार समझौते को नई दिल्ली द्वारा हासिल की गई "सर्वश्रेष्ठ डील" करार दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके शर्तें पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों को मिली शर्तों से कहीं बेहतर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बड़ी सफलता की पुष्टि करते हुए खुशी जाहिर की कि "मेड इन इंडिया (Made in India) प्रोडक्ट्स पर अब 18% का कम टैरिफ लगेगा." यह समझौता भारतीय किसानों, MSMEs, उद्यमियों और कुशल कामगारों के लिए "अभूतपूर्व अवसर" खोलेगा, साथ ही 'मेक इन इंडिया' (Make in India) पहल को मजबूत करेगा और उन्नत अमेरिकी टेक्नोलॉजी तक पहुँच को आसान बनाएगा। गोयल ने इस करार को एक "ऐतिहासिक मोड़" बताया जो भारत को "विकसित भारत 2047" की ओर ले जाने की गति को तेज करेगा। यह अहम कदम भारत के हाल ही में यूरोपीय संघ (EU) के साथ हुए व्यापार समझौते के बाद आया है।

अमेरिकी दावों और भारत की जवाबी प्रतिबद्धताएं

जहां भारतीय एक्सपोर्ट (Export) पर 18% तक टैरिफ की कमी को एक बड़ी जीत के तौर पर पेश किया जा रहा है, वहीं भारत से होने वाली जवाबी प्रतिबद्धताओं का पूरा दायरा जांच का विषय बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया था कि भारत अपने टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर्स (Non-Tariff Barriers) को "शून्य" तक कम करेगा और अमेरिकी सामानों, जैसे ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और कृषि उत्पादों की खरीद में काफी बढ़ोतरी करेगा। हालांकि, रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के विभिन्न सेक्टर्स पर लागू टैरिफ अभी भी अमेरिकी दरों से अधिक हैं, और सरकार ने पहले भी टैरिफ को अप्रत्याशित रूप से बदला है। अमेरिका लगातार भारत से कृषि, फार्मास्यूटिकल्स और सेवाओं जैसे सेक्टर्स में नॉन-टैरिफ बैरियर्स को हटाने का आग्रह करता रहा है, जिसमें जटिल नियम और कड़े घरेलू मानक बाधक बताए गए हैं। "बेस्ट डील" वाली बात तब और जटिल हो जाती है जब भारत के 2019 में रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) से बाहर निकलने के रणनीतिक फैसले को देखा जाता है। चीन के साथ व्यापार घाटे और घरेलू उद्योगों पर पड़ने वाले संभावित असर की चिंताओं के कारण भारत ने यह कदम उठाया था। दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समूह RCEP को कुछ लोग चीन से आयात बढ़ने का जरिया मानते थे, जबकि अमेरिकी डील में भारत का ऐतिहासिक रूप से ट्रेड सरप्लस (Trade Surplus) रहा है।

प्रतिस्पर्धी स्थिति और पिछला इतिहास

साल 2019-2020 में अमेरिका के साथ भारत का $17.42 बिलियन का ट्रेड सरप्लस (Trade Surplus), RCEP देशों के साथ बड़े ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) के बिल्कुल विपरीत है। यह अमेरिका के साथ साझेदारी को प्राथमिकता देने के पीछे की रणनीतिक गणना को रेखांकित करता है। RCEP से बाहर निकलने के फैसले ने, हालांकि चीन से सस्ते माल के आयात को रोकने में मदद की, लेकिन यह भारत के लिए व्यापक क्षेत्रीय वैल्यू चेन (Value Chain) और बाजार एकीकरण के अवसरों को सीमित कर सकता था। विश्लेषकों का मानना है कि भारत ने पिछले फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) में बड़े ट्रेड डेफिसिट का सामना किया है, जिससे ऐसे समझौतों के लाभ की स्थिरता पर सवाल उठते हैं यदि घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता को नहीं बढ़ाया गया। खुद अमेरिका ने पहले भारतीय स्टील और एल्युमिनियम पर टैरिफ लगाए थे, और हार्ले-डेविडसन (Harley-Davidson) जैसी मोटरसाइकिलों पर भारत के टैरिफ से भी असंतोष जाहिर किया था, जिसके कारण जवाबी कार्रवाई और WTO में चुनौतियां भी देखी गईं। मौजूदा समझौते की सफलता, केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका की जवाबी कार्रवाई में भी, विभिन्न सेक्टर्स में लगातार मार्केट एक्सेस (Market Access) और टैरिफ व नॉन-टैरिफ बैरियर्स (Non-Tariff Barriers) के प्रभावी कमी पर निर्भर करेगी।

सेक्टर-वार असर और आगे की राह

इस समझौते से भारतीय एक्सपोर्ट (Export) को बढ़ावा मिलने और मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) व सर्विसेज (Services) में ग्रोथ को पुनर्जीवित करने की उम्मीद है, साथ ही ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। हालांकि, खास सेक्टर्स पर इसके असर पर करीब से नजर रखने की जरूरत है। जहां भारत से इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन के एक्सपोर्ट (Export) में मजबूत ग्रोथ दिखी है, वहीं टेक्सटाइल्स, जेम्स और ज्वेलरी जैसे पारंपरिक क्षेत्रों ने अमेरिकी बाजार में चुनौतियों का सामना किया है या उनकी ग्रोथ धीमी रही है, जिसका आंशिक कारण मौजूदा व्यापारिक समीकरण और पिछले अमेरिकी टैरिफ एक्शन हैं। भारतीय एक्सपोर्ट के लिए 18% तक के अमेरिकी टैरिफ में कमी, अन्य एशियाई देशों के मुकाबले (20-30% के उच्च टैरिफ दरों वाले) एक प्रतिस्पर्धी बढ़त प्रदान करती है। सरकार का 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और PLI जैसी स्कीम्स के माध्यम से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर फोकस, इस समझौते का लाभ उठाने और भविष्य की व्यापार नीति के झटकों के खिलाफ लचीलापन बनाने में महत्वपूर्ण होगा। दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी व्यापार नीति को कितनी प्रभावी ढंग से नेविगेट करता है, अपने बाजारों में विविधता लाता है, और विकसित होती व्यापारिक गतिशीलता व संरक्षणवादी प्रवृत्तियों वाले वैश्विक माहौल में घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाता है।

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