India-US Trade Deal: भारत को मिली बड़ी राहत, एक्सपोर्ट्स को मिलेगा बूस्ट!

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India-US Trade Deal: भारत को मिली बड़ी राहत, एक्सपोर्ट्स को मिलेगा बूस्ट!
Overview

भारत और अमेरिका के बीच हुए नए ट्रेड एग्रीमेंट से भारतीय एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत मिली है। इस डील के तहत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर लगने वाले टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया है, जिससे देश के GDP ग्रोथ में 20 से 30 बेसिस पॉइंट तक का उछाल आने की उम्मीद है।

टैरिफ में कटौती और तत्काल आर्थिक फायदा

2 फरवरी को भारत और अमेरिका के बीच हुए ट्रेड समझौते ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव को काफी कम कर दिया है। इस समझौते के तहत, भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों पर लगने वाले टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है। इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि इस फैसले से भारत की GDP ग्रोथ में 20 से 30 बेसिस पॉइंट का इजाफा हो सकता है, खासकर फाइनेंशियल ईयर 2027 तक।

इस खबर के आते ही शेयर बाजार में भी तेजी देखने को मिली। भारत के प्रमुख इक्विटी बेंचमार्क Sensex और Nifty 50 में जोरदार उछाल आया, और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी लगभग 1% मजबूत हुआ। अप्रैल 2024 से व्यापारिक संबंध तल्ख होने के बाद, यह एक अहम पॉजिटिव संकेत है। इस डील से क्रॉस-बॉर्डर बिजनेस में एक बार फिर स्थिरता आने की उम्मीद है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन से जुड़े सेक्टर्स में अटकी हुई इन्वेस्टमेंट (investment) की संभावनाओं को पंख लग सकते हैं।

वैश्विक चुनौतियों के बीच तुलनात्मक बढ़त

अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 18% का नया टैरिफ रेट, कई एशियाई देशों के मुकाबले भारत को फायदे की स्थिति में लाता है। बांग्लादेश, श्रीलंका, ताइवान और वियतनाम जैसे देशों पर अभी भी 20% टैरिफ लग रहा है, जबकि इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस और पाकिस्तान पर 19% टैरिफ है। हालांकि यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन यह भारत को परिधान (apparel), फुटवियर और लाइट मैन्युफैक्चरिंग जैसे कॉस्ट-सेंसिटिव सेक्टर्स में सीधे तौर पर बेहतर प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस (price competitiveness) देता है।

खासकर टेक्सटाइल एक्सपोर्ट्स के लिए अमेरिकी बाजार बहुत अहम है, जहां से भारत अपने कुल एक्सपोर्ट का करीब 28% करता है। यह डील प्राइस गैप को कम करने और अमेरिकी रिटेलर्स को सप्लाई करने वाले एक्सपोर्टर्स को सपोर्ट करने का लक्ष्य रखती है। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह बढ़त ऐसे ग्लोबल ट्रेड माहौल में है जहां संरक्षणवाद (protectionism) बढ़ रहा है, टेक्निकल बैरियर्स (technical barriers) सख्त हो रहे हैं और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने पर जोर दिया जा रहा है। लंबी अवधि में इस बढ़त की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत इन वैश्विक बदलावों से कैसे निपटता है और अपनी आंतरिक कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) को कैसे मजबूत करता है।

सेक्टर-विशिष्ट असर और भविष्य की अनिश्चितताएँ

इस डील से मुख्य रूप से टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी और मरीन प्रोडक्ट्स जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को फायदा होने की उम्मीद है, क्योंकि बेहतर प्राइसिंग और मार्जिन स्टेबिलिटी मिलेगी। वहीं, फार्मास्युटिकल्स (pharmaceuticals) और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स (consumer electronics) जैसे सेक्टर्स पर इसका सीधा असर कम रहने की संभावना है, जिन पर पहले से ही कम टैरिफ लागू थे।

एनालिस्ट्स (Analysts) की राय फिलहाल सावधानी भरी उम्मीद वाली है। कुछ का अनुमान है कि GDP ग्रोथ में 20 से 30 बेसिस पॉइंट का इजाफा हो सकता है, और कुछ तो भारत की GDP को 7.4% से ऊपर जाते हुए देख रहे हैं। Motilal Oswal Financial Services का मानना है कि यह एक स्ट्रक्चरल पॉजिटिव (structural positive) मूव है जिससे बाजार प्रदर्शन में मजबूती बनी रह सकती है।

लेकिन, समझौते की पूरी डिटेल्स, जैसे कि किन प्रोडक्ट्स पर यह लागू होगा और इसके लागू होने की समय-सीमा क्या होगी, इसको लेकर अभी भी कुछ अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। साथ ही, रूस से तेल खरीद में भारत का बदलाव भी इस समीकरण को और जटिल बना सकता है। असल परीक्षा केवल टैरिफ कम होने की नहीं, बल्कि इस बेहतर ट्रेड माहौल का इस्तेमाल करके भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाना और आर्थिक संरचनात्मक मुद्दों को हल करना होगा।

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