ट्रेड डील में तेजी!
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का यह भरोसा दोनों देशों के बीच चल रही सक्रिय बातचीत, हाल की मुलाकातों और फिलहाल टैरिफ (Tariff) पर लगी रोक का नतीजा है। इससे डील को फाइनल करने का माहौल बन रहा है। इस प्रस्तावित समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) को बढ़ाना है, जो अभी $190 बिलियन सालाना से ज्यादा है। लक्ष्य है कि 2030 तक इसे $500 बिलियन तक पहुंचाया जाए। फिलहाल, दोनों देश एक अंतरिम समझौते से आगे बढ़कर एक ज्यादा व्यापक ढांचा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे दोनों देशों की समृद्धि बढ़े। भारत ने कृषि आयात (Agricultural Imports) में कुछ रियायतें देने और कुछ अमेरिकी सामानों पर टैरिफ (Tariff) कम करने की इच्छा जताई है, जिसके बदले में वह फार्मास्युटिकल्स (Pharmaceuticals), टेक्सटाइल (Textiles) और आईटी (IT) सेवाओं के लिए अमेरिका में बेहतर बाजार पहुंच चाहता है।
सेक्टरों पर असर और प्रतिस्पर्धा
इस ट्रेड डील (Trade Deal) से कई सेक्टरों पर बड़ा असर पड़ने की उम्मीद है, खासकर भारत के एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड (Export-Oriented) इंडस्ट्रीज को बढ़ावा मिलेगा। टेक्सटाइल और अपैरल, मशीनरी, केमिकल, प्लास्टिक, रबर गुड्स, जेम्स और ज्वैलरी, और ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स जैसे सेक्टरों को इसका सीधा फायदा हो सकता है। अमेरिकी टैरिफ (Tariff) में कमी से भारतीय सामानों की कीमत अधिक प्रतिस्पर्धी (Competitive) हो जाएगी और एक्सपोर्टर्स के लिए कमाई की संभावना बढ़ेगी। उदाहरण के लिए, टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर, जो भारत का एक बड़ा एक्सपोर्ट सेक्टर है, को टैरिफ में कमी का सबसे ज्यादा फायदा होने का अनुमान है। वहीं, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) सेवाओं पर सीधे टैरिफ का असर न होने के बावजूद, बेहतर व्यापारिक संबंधों और भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव कम होने से सकारात्मक माहौल बनने की उम्मीद है।
हालांकि, अन्य क्षेत्रीय देशों की तुलना में भारत को मिलने वाला वास्तविक प्रतिस्पर्धी फायदा (Competitive Advantage) मामूली हो सकता है। जहां भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ (Tariff) 18% होगा, वहीं वियतनाम जैसे देशों को 20%, बांग्लादेश को 19% और जापान व दक्षिण कोरिया को करीब 15% टैरिफ का सामना करना पड़ता है। इसका मतलब है कि भारत का फायदा सिर्फ 2-3% का हो सकता है, जो अक्सर लागत के अंतर और दूसरे देशों की बड़े पैमाने की उत्पादन क्षमता के सामने कम पड़ सकता है। ऐसे सेक्टरों में, जहां मुनाफा मार्जिन (Profit Margin) पहले से ही कम होता है, यह अंतर बांग्लादेश या वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले स्थायी प्रतिस्पर्धा (Sustained Competitiveness) में तब्दील नहीं हो पाएगा।
नीतियों में अस्थिरता और कृषि संबंधी चिंताएं
उम्मीदों के बावजूद, ट्रेड डील (Trade Deal) के फायदों की निरंतरता एक चिंता का विषय बनी हुई है, खासकर अमेरिकी प्रशासन की नीतियों में बदलाव के इतिहास को देखते हुए। सप्लाई चेन (Supply Chain) प्रोफेशनल्स को सलाह दी जाती है कि वे टैरिफ (Tariff) की स्थायी प्रकृति के बारे में अपनी धारणाओं का परीक्षण करें और आकस्मिक योजनाएं (Contingency Plans) तैयार रखें। कृषि क्षेत्र एक बड़ा मुद्दा है। हालांकि भारत का कहना है कि संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्र सुरक्षित हैं, लेकिन अमेरिका से कृषि आयात (Agricultural Imports) को मंजूरी देने, जिसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) उत्पाद भी शामिल हो सकते हैं, से भारत के लाखों छोटे किसानों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्रों पर डील के प्रभाव पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि इससे घरेलू कीमतों पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, भले ही डील का मकसद सप्लाई चेन (Supply Chain) को मजबूत करना है, लेकिन व्यापार की मात्रा बढ़ने से लॉजिस्टिक्स (Logistics) पर दबाव और निर्यात हब पर भीड़ बढ़ सकती है।
भविष्य का दृष्टिकोण
अमेरिका और भारत ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) को $500 बिलियन तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। मौजूदा ट्रेड डील (Trade Deal) को एक मध्यम अवधि के संरचनात्मक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा (Export Competitiveness) और वैश्विक एकीकरण को बढ़ाने के लिए निरंतर क्रियान्वयन महत्वपूर्ण होगा। KPMG और AMCHAM का अनुमान है कि अमेरिका-भारत व्यापार एक उच्च-विकास चरण में प्रवेश कर रहा है, जो मजबूत सप्लाई चेन (Supply Chain), तकनीकी सहयोग और विनिर्माण (Manufacturing) और सेवाओं में गहरे एकीकरण से प्रेरित है। सेमीकंडक्टर, रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा को भविष्य के विकास के प्रमुख चालक के रूप में पहचाना गया है, जिसमें विनिर्माण एकीकरण, प्रौद्योगिकी आश्वासन और ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
