भारतीय निर्यातकों का ध्यान अब अमेरिका से घटती मांग के बीच यूनाइटेड किंगडम (UK) की ओर बढ़ रहा है। खास कैटेगरी में UK को निर्यात **24%** बढ़कर **$4.98 बिलियन** हो गया है। **15 जुलाई** से लागू होने वाला इंडिया-UK का ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) टैरिफ कम करेगा, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर और फार्मा कंपनियों के लिए नए रास्ते खुलेंगे।
अमेरिका की मांग में नरमी, ब्रिटेन की ओर बढ़े एक्सपोर्टर्स
भारतीय एक्सपोर्टर्स, खासकर अमेरिका से मांग में आई सुस्ती को देखते हुए, अब यूनाइटेड किंगडम (UK) को अपना प्रमुख डेस्टिनेशन बना रहे हैं। 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, UK को कुल निर्यात में 7.6% की गिरावट आकर $13.44 बिलियन रहा, लेकिन कुछ खास प्रोडक्ट कैटेगरी में 24% की ग्रोथ देखी गई, जो $4.98 बिलियन तक पहुंच गया। यह रणनीति भारतीय निर्माताओं को ग्लोबल मार्केट में अपनी मौजूदगी बढ़ाने और अमेरिकी बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में मदद कर रही है, जहां कई अहम उत्पादों की मांग 50% से ज्यादा गिरी है।
CETA ट्रेड एग्रीमेंट का असर
15 जुलाई से लागू होने वाला इंडिया-UK कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) इस बदलाव को और गति देगा। यह एग्रीमेंट व्यापार बाधाओं को कम करके और कई तरह के गुड्स पर टैरिफ घटाकर भारतीय उत्पादों को ब्रिटिश मार्केट में ज्यादा कॉम्पिटिटिव बनाएगा। निवेशकों के लिए यह एक अहम फैक्टर है, क्योंकि इससे उन कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में सुधार हो सकता है जहां कस्टम ड्यूटी हमेशा से एक बड़ा कॉस्ट फैक्टर रही है। यह उन फर्मों के लिए फायदेमंद हो सकता है जो पहले से ही UK में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं, जिससे इंटरनेशनल मार्केट से उनके रेवेन्यू शेयर में बढ़ोतरी हो सकती है।
सेक्टर-वाइज ग्रोथ
यह विविधीकरण रणनीति कई उद्योगों में नतीजे दिखा रही है। फूड प्रोसेसिंग और एग्रीकल्चर सेक्टर में मांग बढ़ी है, जिसमें इंस्टेंट फ्लेवर्ड कॉफी का निर्यात UK में 1,533% बढ़ा है। अन्य हाई-ग्रोथ एरिया में डेकोरेटिव लैमिनेट्स में 22%, कैस्टर ऑयल में 18% और फ्रोजन सब्जियों में 17% की वृद्धि हुई है।
मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल स्पेस में, हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स पर फोकस करने वाली कंपनियां आगे बढ़ रही हैं। एंटी-कैंसर दवाओं का निर्यात 23% बढ़ा है, जो स्पेशलाइज्ड फार्मास्युटिकल गुड्स की ओर सफल कदम दर्शाता है। टेक्सटाइल और होम फर्निशिंग जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टरों ने भी मजबूती दिखाई है, जिसमें कॉटन टी-शर्ट का निर्यात 4% और कारपेट एक्सपोर्ट 17% बढ़ा है। CETA के बाद इस मोमेंटम को बनाए रखने की क्षमता इन कंपनियों की कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस पर निर्भर करेगी। अमेरिका में मंदी के बीच यह शिफ्ट एक सहारा जरूर दे रही है, लेकिन प्रॉफिटेबिलिटी अंततः लॉजिस्टिक्स कॉस्ट, क्वालिटी स्टैंडर्ड्स और यूरोपियन मार्केट की प्राइसिंग को मैनेज करने पर निर्भर करेगी।
