15 जुलाई, 2026 से भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। नए भारत-यूके सोशल सिक्योरिटी समझौते के तहत, जो भारतीय कर्मचारी अस्थायी असाइनमेंट पर यूके में काम करने जाएंगे, उन्हें अब दोनों देशों में सोशल सिक्योरिटी के लिए अलग-अलग भुगतान नहीं करना पड़ेगा।
क्या है नया नियम?
15 जुलाई, 2026 से लागू होने वाले इस नए समझौते (Double Contribution Convention - DCC) के अनुसार, यूके में अस्थायी तौर पर काम करने वाले भारतीय प्रोफेशनल्स को वहां की सोशल सिक्योरिटी स्कीम में पैसा नहीं देना होगा। इसका मतलब है कि अब वे भारत और यूके, दोनों देशों की सोशल सिक्योरिटी स्कीम में एक साथ योगदान देने के बोझ से मुक्त होंगे।
प्रोफेशनल्स और कंपनियों को कैसे होगा फायदा?
पहले कई भारतीय कर्मचारियों को यूके में रहते हुए वहां की सोशल सिक्योरिटी में भी भुगतान करना पड़ता था, लेकिन अस्थायी अवधि के कारण वे वहां से कोई खास लाभ नहीं ले पाते थे। इस नए समझौते से योग्य कर्मचारियों और उन्हें भेजने वाली कंपनियों को यूके के सोशल सिक्योरिटी भुगतान से 5 साल तक की छूट मिलेगी। यह पुरानी 3 साल की छूट की सीमा से एक बड़ा बदलाव है, जो कंपनियों और कर्मचारियों को लंबी अवधि की परियोजनाओं के लिए अधिक राहत देगा।
यह बदलाव खासकर आईटी (IT), कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग और फाइनेंस जैसे सेक्टरों में काम करने वाले हजारों प्रोफेशनल्स की टेक-होम सैलरी और रिटायरमेंट प्लानिंग पर सीधा असर डालेगा। अब यह पैसा सीधे भारत के एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) में जमा हो सकेगा, जिससे स्थानीय नियमों के तहत उनके निवेश पर बेहतर रिटर्न मिलेगा।
रिटायरमेंट और कंपनी की लागत पर असर
किसी भी प्रोफेशनल के लिए, इसका मतलब है कि उसकी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा अब विदेश में जमा होने के बजाय उसके पास रहेगा या सीधे EPF में जाएगा। पहले, अनिवार्य योगदान के कारण सैलरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विदेश में चला जाता था, जिससे अक्सर भारत लौटने पर उन्हें वह पैसा वापस मिलना मुश्किल हो जाता था। अब, यह राशि भारत में ही जमा होने से वे अपने रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा फंड तैयार कर सकेंगे।
कंपनियों के लिए, यूके में कर्मचारियों को भेजने की कुल लागत कम हो जाएगी। जिन कंपनियों की टीमें छोटी अवधि की परियोजनाओं पर काम करती हैं, उन्हें अब यूके सोशल सिक्योरिटी पेमेंट्स का अतिरिक्त बोझ नहीं उठाना पड़ेगा, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय संचालन की कुल लागत कम होगी। यह समझौता भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद करेगा।
सीमाएं और ध्यान रखने योग्य बातें
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह समझौता केवल अस्थायी असाइनमेंट पर लागू होता है। जो लोग स्थायी रूप से यूके में बस गए हैं या स्थानीय यूके-आधारित रोजगार अनुबंध पर काम कर रहे हैं, उन पर यह नियम लागू नहीं होगा। किसी भी व्यक्ति को होने वाला वास्तविक वित्तीय लाभ उसके ग्रॉस वेतन, रोजगार अनुबंध की संरचना और EPF योगदान से संबंधित मौजूदा नियमों पर निर्भर करेगा। यह नीति विदेश में काम करने वालों के लिए वित्तीय प्रक्रिया को सरल बनाती है, लेकिन निवेशकों और कर्मचारियों के लिए मुख्य बात यह होगी कि कंपनियां इस नई व्यवस्था को अपने पेरोल (Payroll) में कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं।
