भारतीय सरकारी बॉन्ड्स में वैल्यूएशन का खेल
यह कदम पारंपरिक केंद्रीय बैंक की तटस्थ भूमिका से हटकर है, जिसमें सरकार खुद करेंसी की स्थिरता के लिए मार्केट में सीधे उतर आई है। बैंकों के लिए करेंसी इंश्योरेंस की लागत को प्रभावी ढंग से सब्सिडी देकर, केंद्रीय बैंक कैरी ट्रेड (Carry Trade) के लिए बाधाओं को कम कर रहा है, बशर्ते कि अस्थिरता नियंत्रण में रहे। हालांकि, रुपये का अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.95 तक मजबूत होना एक मनोवैज्ञानिक सहारा दे रहा है, लेकिन इसका असली असर वैश्विक बॉन्ड पोर्टफोलियो के यील्ड (Yield) में बढ़ोतरी के रूप में दिखेगा। 12.5% के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (Long-term Capital Gains Tax) और 20% के विदहोल्डिंग टैक्स को हटाने से भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज पर टैक्स के बाद मिलने वाला रिटर्न बढ़ जाता है। इससे ये बॉन्ड्स इंडोनेशिया या थाईलैंड जैसे क्षेत्रीय देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गए हैं।
लिक्विडिटी का जरिया और बड़े जोखिम
अल्ट्रा-लॉन्ग ड्यूरेशन वाले 40-साल के सिक्योरिटीज को फुली एक्सेसिबल रूट (Fully Accessible Route) में शामिल करने का मतलब है कि सरकार लंबी अवधि के उधार की लागत को स्थिर करना चाहती है। हालांकि, बैलेंस ऑफ पेमेंट (Balance of Payment) को मजबूत करने के लिए फॉरेन पोर्टफोलियो इनफ्लो (Foreign Portfolio Inflows) पर निर्भरता एक बड़ी कमजोरी है। सरकारी कर्ज में विदेशी निवेश को बढ़ावा देकर, देश वैश्विक जोखिम उठाने की क्षमता में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहा है। अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) अपनी सख्त मौद्रिक नीति (Hawkish Stance) बनाए रखता है या अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेज उछाल आता है, तो इन इंस्ट्रूमेंट्स में "हॉट मनी" (Hot Money) का अचानक आना रिवर्स हो सकता है, जिससे लिक्विडिटी का संकट पैदा हो सकता है। सिक्योरिटी-वाइज कैप (Security-wise Caps) को हटाने का मकसद इंस्टीट्यूशनल वॉल्यूम (Institutional Volume) बढ़ाना है, लेकिन यह रेगुलेटर की क्षमता को भी सीमित करता है अगर करेंसी पर सट्टा दबाव बढ़ता है।
बारीकियाँ और संभावित खतरे
इस पॉलिसी बदलाव में घरेलू महंगाई (Inflation) और मॉनेटरी ट्रांसमिशन (Monetary Transmission) को लेकर खास जोखिम हैं। अगर सब्सिडी वाली हेजिंग से डॉलर-से-रुपया कैरी ट्रेड में अत्यधिक गतिविधि होती है, तो इससे उत्पन्न होने वाली अतिरिक्त रुपया लिक्विडिटी घरेलू महंगाई को बढ़ा सकती है। ऐसे में, केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी के एक ऐसे चक्र में फंसना पड़ सकता है जो उल्टा साबित हो। इसके अलावा, भारत के बाहर रहने वाले व्यक्तियों के लिए इक्विटी निवेश को उदार बनाने से रिटेल भागीदारी का आधार चौड़ा होता है, लेकिन यह मिड-कैप सेगमेंट में अस्थिरता पैदा कर सकता है, जहां व्यक्तिगत फ्लो से कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो सकता है। इन टैक्स छूटों का आक्रामक स्वरूप – जिसमें बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (Bank for International Settlements) भी शामिल है – यह दर्शाता है कि सरकार विदेशी मुद्रा भंडार में कमी को लेकर आधिकारिक तौर पर स्वीकार की गई चिंताओं से कहीं अधिक गंभीर स्थिति में हो सकती है।
भविष्य की मार्केट पोजिशनिंग
मार्केट पार्टिसिपेंट्स अब तुलनात्मक स्थिरता की अवधि का अनुमान लगा रहे हैं, बशर्ते सरकार अपनी वर्तमान फिस्कल पॉलिसी (Fiscal Stance) पर कायम रहे। विश्लेषकों का ध्यान अब आने वाले तिमाही के करंट अकाउंट बैलेंस (Current Account Balance) के आंकड़ों पर है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या ये उपाय साल-दर-साल हुए भारी बहिर्वाह की भरपाई के लिए पर्याप्त हैं। एंट्री के लिए स्ट्रक्चरल बैरियर्स (Structural Barriers) को कम करने के साथ, भारतीय गिल्ट्स (Indian Gilts) और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच सहसंबंध (Correlation) के कसने की उम्मीद है, जो स्थानीय ऋण बाजार को वैश्विक मैक्रो-इकोनॉमिक साइकल्स (Global Macro-economic Cycles) से और अधिक बारीकी से जोड़ेगा।
