India Trade Talks: अमरीकी डील पर भारत की बड़ी मांग, बढ़ाई जा सकती हैं मुश्किलें

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India Trade Talks: अमरीकी डील पर भारत की बड़ी मांग, बढ़ाई जा सकती हैं मुश्किलें
Overview

भारत और अमरीका के बीच लंबित व्यापार डील (trade deal) के बीच एक बड़ी अड़चन आ गई है। भारत ने इस डील को फाइनल करने के लिए अमरीका से सेक्शन 301 (Section 301) टैरिफ से राहत और बेहतर मार्केट एक्सेस की मांग रखी है। डील का 99% हिस्सा फाइनल हो चुका है, लेकिन यह गैर-जरूरी मांगें (non-negotiable demands) व्यापारिक रिश्तों के भविष्य को तय करेंगी।

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सेक्शन 301: डील का सबसे बड़ा मुद्दा

फिलहाल, अमरीका और भारत के बीच व्यापार बातचीत में सबसे बड़ा रोड़ा सेक्शन 301 ऑफ द ट्रेड एक्ट 1974 से छूट की मांग है। भारत चाहता है कि अमरीका इस सेक्शन के तहत लगने वाले टैरिफ से उसे बाहर रखे। आपको बता दें कि यह सेक्शन अमरीका को उन विदेशी कंपनियों पर जवाबी शुल्क (retaliatory duties) लगाने का अधिकार देता है, जो अमरीकी उद्योगों के साथ भेदभाव करती हैं। भारत की यह मांग एक सामान्य टैरिफ कटौती समझौते से कहीं बढ़कर है, क्योंकि वह अमरीकी व्यापार नियमों के अनिश्चितता से अपने निर्यातकों को बचाना चाहता है।

वियतनाम की राह पर भारत?

भारत ने यह मांग वियतनाम के तर्ज पर रखी है, जिसने पहले के द्विपक्षीय समझौतों से बेहतर मार्केट एक्सेस हासिल किया था। भारतीय नीति-निर्माता अब इस स्थिति में नहीं रहना चाहते कि वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के मुकाबले उनके उत्पादों पर ज्यादा लागत आए। यह मांग अमरीकी इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल सेक्टर में बराबरी लाने की दिशा में एक कदम है। जहां व्यापार के 99% हिस्से में प्रशासनिक तालमेल (administrative synchronization) और कस्टम फैसिलिटेशन (customs facilitation) जैसे मुद्दे शामिल हैं, वहीं असली आर्थिक फायदा आखिरी 1% में छिपा है। इन रियायतों के बिना, भारत के लिए इस डील पर हस्ताक्षर करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है।

अमरीका का रुख और अड़चनें

इस डील के रास्ते में दोनों तरफ से संस्थागत प्रतिरोध (institutional resistance) भी है। अमरीका में, यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) पर घरेलू लॉबीज़ का दबाव है कि वे मार्केट एक्सेस के मामले में सख्त रुख अपनाएं, खासकर कृषि और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में जहां भारत के अपने नियामक प्रतिबंध (restrictive regulatory barriers) हैं। अगर USTR भारत की सेक्शन 301 से छूट की मांग मान लेता है, तो घरेलू निर्माताओं की ओर से नाराजगी आ सकती है, जो इसे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा (fair competition) के खिलाफ मानते हैं। इसके अलावा, अमरीका अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए 'ऑनशोरिंग' (onshoring) पर जोर दे रहा है, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

आगे की राह

इस हफ्ते दिल्ली में व्यापार प्रतिनिधिमंडल (trade delegations) फिर से मिलने वाले हैं ताकि कूटनीतिक उम्मीदों और आर्थिक हकीकत के बीच की खाई को पाटा जा सके। इस बातचीत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अमरीका, नई दिल्ली के साथ व्यापक तालमेल के लिए अपने प्रवर्तन उपकरणों (enforcement tools) पर कितनी रियायत देने को तैयार है। निवेशकों को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) से मार्केट एक्सेस पर किसी भी तरह की छूट के संकेतों पर नजर रखनी चाहिए। यही इस बात का मुख्य संकेतक होगा कि डील पर मुहर लगने वाली है या फिर यह अनिश्चित काल के लिए टल जाएगी।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.