भारत की ट्रेड डिफेंस पॉलिसी में बड़ा बदलाव
दशकों से, भारत की डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ ट्रेड रेमेडीज (DGTR) की एंटी-डंपिंग ड्यूटी (ADD) की लगभग सभी सिफारिशें मानी जाती रही हैं। लेकिन अब ट्रेड डिफेंस का यह तरीका पूरी तरह से बदल गया है। नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच, फाइनेंस मिनिस्ट्री ने प्रस्तावित ADDs में से 81% को रिजेक्ट कर दिया है। इस बड़े पॉलिसी चेंज (Policy Change) के कारण घरेलू इंडस्ट्रीज सस्ते इम्पोर्ट्स के आगे बेबस हो गई हैं, खासकर तब जब चीन के साथ भारत का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) रिकॉर्ड $112.16 बिलियन पर पहुंच गया है।
घरेलू इंडस्ट्रीज पर असर
इस पॉलिसी शिफ्ट (Policy Shift) का आर्थिक असर काफी बड़ा है। घरेलू इंडस्ट्रीज को तत्काल सालाना ₹11,938 करोड़ का नुकसान झेलना पड़ रहा है। अगर समय रहते कोई कदम नहीं उठाया गया, तो 2030 तक यह निगेटिव असर बढ़कर ₹2.70 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। केमिकल्स, स्टील और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर्स (Sectors) खासतौर पर निशाने पर हैं। इसके अलावा, ₹27,427 करोड़ के ऐसे इन्वेस्टमेंट प्लान्स भी अब अनिश्चित हो गए हैं, जो विदेशी कंपीटिशन (Foreign Competition) केunchecked डर के चलते खतरे में हैं।
इन्फ्लेशन (Inflation) बनाम इंडस्ट्रियल हेल्थ (Industrial Health)
एक्सपर्ट्स (Experts) का कहना है कि सरकार की हिचकिचाहट, जो अक्सर इन्फ्लेशन (Inflation) को लेकर होती है, वह गलत है। एनालिसिस (Analysis) बताती है कि इन ड्यूटीज (Duties) का कंज्यूमर प्राइसेज (Consumer Prices) पर असर बहुत कम, अक्सर 0.10% से भी नीचे होता है। असली खतरा इंडस्ट्रियल कैपेसिटी (Industrial Capacity) के लिए है। यह पॉलिसी खासकर माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है, क्योंकि उनमें से कई के पास मुकाबला करने की फाइनेंशियल स्ट्रेंथ (Financial Strength) नहीं है और कुछ तो सब्लीमेशन-ट्रांसफर पेपर और मोबाइल कंपोनेंट्स जैसे क्षेत्रों में पहले ही बंद हो चुके हैं। यह तरीका भारत को विदेशी सामानों का कंज्यूमर (Consumer) बनाकर, घरेलू एम्प्लॉयमेंट (Employment) और इनोवेशन (Innovation) को कम करने का जोखिम उठा रहा है, खासकर उन देशों की तुलना में जो अमेरिका और चीन जैसे मजबूत ट्रेड डिफेंस मेजर्स (Trade Defense Measures) का इस्तेमाल करते हैं।
ट्रेड पॉलिसी में ट्रांसपेरेंसी (Transparency) की मांग
इंडस्ट्री लीडर्स (Industry Leaders) एक फॉर्मल 'कम्प्लाई-ऑर-एक्सप्लेन' (Comply-or-Explain) सिस्टम की मांग कर रहे हैं। इसके तहत फाइनेंस मिनिस्ट्री को DGTR के फाइंडिंग्स (Findings) को रिजेक्ट करने के किसी भी फैसले का सार्वजनिक रूप से कारण बताना होगा, जिसमें विस्तार से बताया जाए कि घरेलू इंडस्ट्री की चिंताओं को क्यों नजरअंदाज किया गया। ग्लोबल ट्रेड के अस्थिर माहौल में, ट्रेड रेमेडीज (Trade Remedies) पर भारत का यह एड-हॉक (Ad-hoc) तरीका टिकाऊ नहीं है। ट्रेड इन्वेस्टिगेशन्स (Trade Investigations) को निर्णायक पॉलिसी इंप्लीमेंटेशन (Policy Implementation) से जोड़ना भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (Manufacturing Sector) के लॉन्ग-टर्म हेल्थ (Long-term Health) के लिए बेहद जरूरी है।
