जून महीने में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Merchandise Trade Deficit) बढ़कर **$30.4 अरब** डॉलर हो गया है। इसकी मुख्य वजह आयात (Imports) में **31%** की जोरदार बढ़ोतरी है, जो **$70.8 अरब** डॉलर तक पहुंच गया। एक्सपोर्ट्स (Exports) में **15.5%** की बढ़ोतरी हुई, लेकिन पेट्रोलियम शिपमेंट्स में आई भारी गिरावट ने कुल व्यापार आंकड़ों पर दबाव डाला।
जून में क्यों बढ़ी भारत की आयत?
जून 2024 में भारत के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स $40.4 अरब डॉलर रहे, जो पिछले साल के मुकाबले 15.5% ज़्यादा हैं। हालांकि, मई में 18% की ग्रोथ के मुकाबले यह रफ्तार धीमी रही। इसकी मुख्य वजह पेट्रोलियम उत्पादों के एक्सपोर्ट्स में आई बड़ी गिरावट है, जो जून में केवल 8.9% ही बढ़े। पिछले महीने यह आंकड़ा 55.1% था। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर ऑयल एक्सपोर्ट्स पर साफ दिख रहा है।
नॉन-ऑयल सेक्टर्स की मजबूती
पेट्रोलियम एक्सपोर्ट्स पर दबाव के बावजूद, इकोनॉमी के दूसरे सेक्टर्स ने मजबूती दिखाई है। ऑयल और कीमती कमोडिटीज को छोड़कर एक्सपोर्ट्स में 15.3% की ग्रोथ दर्ज की गई, जो मई के 12.3% से बेहतर है। इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे सेक्टर्स ने इस ग्रोथ को लीड किया। जेम्स एंड ज्वैलरी इंडस्ट्री में भी 34.6% की शानदार रिकवरी देखने को मिली। चावल, मांस और समुद्री उत्पादों जैसे एग्रीकल्चरल शिपमेंट्स ने भी एक्सपोर्ट बास्केट को सहारा दिया।
एक्सपोर्ट्स से तेज बढ़ी आयात
एक्सपोर्ट्स की ग्रोथ के मुकाबले, इंपोर्ट्स (Imports) में 31% की भारी बढ़ोतरी हुई और यह $70.8 अरब डॉलर पर पहुंच गए। इलेक्ट्रॉनिक गुड्स, मशीनरी, ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट और कोयले जैसे सेक्टर्स से इंपोर्ट्स में काफी इजाफा हुआ। फर्टिलाइजर इंपोर्ट्स में तो तीन गुना से भी ज़्यादा का उछाल आया। हालांकि, कच्चे तेल की इंपोर्ट वैल्यू कम रहने से राहत मिली, लेकिन देश में आने वाले सामानों की कुल मात्रा ज्यादा रही। इसके चलते मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट $30.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो मई के $28.2 अरब और पिछले साल जून के $19.1 अरब डॉलर से काफी ज़्यादा है।
करंट अकाउंट डेफिसिट पर असर
ट्रेड डेफिसिट में यह बढ़ोतरी और सर्विसेज ट्रेड सरप्लस में हल्की कमी के चलते देश के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स पर दबाव बढ़ा है। Crisil का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 में करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) जीडीपी का 1.5% तक पहुंच सकता है, जो पिछले फाइनेंशियल ईयर के 0.6% के अनुमान से कहीं ज़्यादा है। एजेंसी का मानना है कि इसका मुख्य कारण कमोडिटी की ऊंची कीमतें और लगातार बना हुआ गुड्स ट्रेड गैप है। आने वाले समय में, निवेशक ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों और ग्लोबल ट्रेड के रुझानों पर नज़र रखेंगे, क्योंकि ये ऐसे क्रिटिकल फैक्टर्स हैं जो देश के इंपोर्ट बिल और इकोनॉमिक स्टेबिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं।
