जून 2026 में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Merchandise Trade Deficit) बढ़कर **$30.43 बिलियन** हो गया है। यह बढ़ोतरी खासतौर पर आयात (Imports) में **31%** की तेज उछाल के कारण हुई है। सरकार का कहना है कि यह कमजोरी नहीं, बल्कि ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर में प्रोडक्टिव इन्वेस्टमेंट (Productive Investment) का नतीजा है।
Detailed Coverage
जून में ट्रेड डेफिसिट क्यों बढ़ा?
आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर $30.43 बिलियन पर पहुंच गया, जो पिछले साल जून 2025 में $19.10 बिलियन था। इस दौरान देश का आयात बिल, निर्यात आय की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा। जून के महीने में मर्चेंडाइज इंपोर्ट (Merchandise Imports) $70.84 बिलियन तक पहुंच गया, जो पिछले साल $54.08 बिलियन था। यह 31% की सालाना बढ़ोतरी है। वहीं, मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट (Merchandise Exports) 15.5% बढ़कर $40.41 बिलियन दर्ज किया गया।
सरकार का क्या है कहना?
वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री, जितेंद्र प्रसाद ने संसद में बताया कि यह बढ़ा हुआ घाटा मुख्य रूप से देश के विकास के लिए जरूरी चीजों की खरीद के कारण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आयात में कच्चे तेल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, कैपिटल गुड्स (Capital Goods) और फर्टिलाइजर्स (Fertilizers) का बड़ा हिस्सा है। सरकारी नजरिए से, ये ऐसे आयात हैं जो सीधे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, ऊर्जा सुरक्षा और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग (Domestic Manufacturing) को बढ़ाने में मदद करते हैं। सरकार इसे आर्थिक कमजोरी नहीं, बल्कि उच्च आर्थिक गतिविधि का संकेत मान रही है।
लंबे समय में देखें तो...
पिछले दो दशकों में भारत की आयात जरूरतें काफी बदली हैं। 2006-07 के फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में जहां कुल आयात $194.81 बिलियन था, वहीं 2025-26 तक यह बढ़कर $776.01 बिलियन हो गया। यह लगभग चार गुना बढ़ोतरी देश की ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) में बढ़ती भागीदारी और औद्योगीकरण के लिए इनपुट्स की बढ़ती मांग को दर्शाती है। सरकार का कहना है कि कैपिटल और रॉ मटेरियल (Raw Material) में यह निवेश लंबी अवधि में एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस (Export Competitiveness) को मजबूत करेगा।
मासिक ट्रेड पर असर डालने वाले फैक्टर्स
जून 2026 के ट्रेड फिगर्स (Trade Figures) पर ग्लोबल फैक्टर्स (Global Factors) का भी असर रहा, खासकर कच्चे तेल और कीमती धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव। जब इन कमोडिटीज (Commodities) की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो भारत का इंपोर्ट बिल ऊर्जा पर निर्भरता के कारण जल्दी बढ़ जाता है। निवेशक इन आंकड़ों पर नजर रखते हैं क्योंकि ये करंट अकाउंट बैलेंस (Current Account Balance) और भारतीय रुपए पर संभावित दबाव के बारे में जानकारी देते हैं। ट्रेड डेफिसिट, यानी निर्यात और आयात का अंतर, लगातार उच्च आयात स्तर घरेलू ब्याज दरों और महंगाई पर असर डाल सकता है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयात में यह बढ़ोतरी अस्थायी है या ऊर्जा और कैपिटल गुड्स की खरीद का एक स्थायी ट्रेंड।
