भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Merchandise Trade Deficit) मई 2026 में बढ़कर **$28.26 अरब** पर पहुंच गया है। कुल आयात **$73.40 अरब** तक चढ़ गए, जबकि एक्सपोर्ट **$45.14 अरब** पर बना रहा। तेल और अन्य वस्तुओं की बढ़ती आयात मांग ने ट्रेड बैलेंस पर दबाव डाला है।
Detailed Coverage
भारत की इकोनॉमी का हाल: RBI का नया डेटा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मई 2026 के आंकड़ों से देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर साफ हो रही है। नए फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत में हालात मिले-जुले रहे। मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट (Merchandise Exports) मई में $45.14 अरब पर पहुंच गया, जो अप्रैल के $43.72 अरब से बेहतर है। इसमें नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट (Non-oil Exports) का बड़ा योगदान रहा, जो बढ़कर $36.74 अरब हो गया। इससे पता चलता है कि ग्लोबल मार्केट्स में अभी भी भारतीय सामानों की मांग बनी हुई है।
आयात का बढ़ता बोझ
हालांकि, एक्सपोर्ट की इस अच्छी परफॉर्मेंस के बावजूद, आयात का बिल बढ़ गया है। मई 2026 में मर्चेंडाइज इंपोर्ट (Merchandise Imports) पिछले महीने के $71.93 अरब से बढ़कर $73.40 अरब हो गया। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह कच्चे तेल का आयात (Oil Imports) रहा, जो भारत के कुल आयात खर्च में एक बड़ा हिस्सा है। नतीजतन, मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Merchandise Trade Deficit) बढ़कर $28.26 अरब पर पहुंच गया, जो देश के बाहरी व्यापार संतुलन पर लगातार दबाव दिखा रहा है।
FDI और पोर्टफोलियो निवेश का खेल
निवेश के मोर्चे पर, लॉन्ग-टर्म और शॉर्ट-टर्म कैपिटल के बीच एक बड़ा अंतर देखने को मिला। फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। अप्रैल और मई 2026 के दो महीनों में नेट $6.5 अरब का FDI आया, जो पिछले साल इसी अवधि के $2.47 अरब से काफी ज्यादा है। $13.77 अरब के ग्रॉस FDI आंकड़े से लगता है कि इंटरनेशनल कंपनियां भारत के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर में लंबे समय के मौके देख रही हैं।
दूसरी तरफ, पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (Portfolio Investments), यानी शेयर और बॉन्ड्स में आने वाला पैसा, थोड़ी अलग कहानी कह रहा है। इसी दो-महीने की अवधि में देश से $12 अरब का नेट पोर्टफोलियो आउटफ्लो (Portfolio Outflows) देखा गया। FDI और पोर्टफोलियो निवेश को मिलाकर, कुल विदेशी निवेश $5.5 अरब का आउटफ्लो रहा। जहां FDI एक स्थिर और लॉन्ग-टर्म कैपिटल है, वहीं पोर्टफोलियो निवेश में ये बड़ी अस्थिरता मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह इक्विटी मार्केट सेंटिमेंट और करेंसी वैल्यूएशन को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकती है।
बाहरी स्थिरता के लिए जरूरी फैक्टर्स
इन दबावों से निपटने के लिए, अर्थव्यवस्था लगातार स्थिर फाइनेंसिंग चैनल्स पर निर्भर है। नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) डिपॉजिट्स मई 2026 तक बढ़कर $165.96 अरब पर पहुंच गए, जिसमें फाइनेंशियल ईयर के पहले दो महीनों में $1.33 अरब का इनफ्लो हुआ। ये डिपॉजिट विदेशी मुद्रा का एक लगातार स्रोत हैं, जो ट्रेड डेफिसिट के असर को संतुलित करने में मदद करते हैं।
आगे चलकर, निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात एक्सपोर्ट ग्रोथ और इंपोर्ट बिल के बीच का संतुलन बनी रहेगी। अगर तेल की कीमतों या अन्य ग्लोबल फैक्टर्स के कारण इंपोर्ट लागत ऊंची बनी रहती है, तो ट्रेड डेफिसिट रुपए पर दबाव डालना जारी रख सकता है। निवेशकों को यह भी देखना होगा कि क्या FDI की यह मजबूत रफ्तार आगे भी जारी रहती है, ताकि पोर्टफोलियो फ्लो में संभावित अस्थिरता को कम किया जा सके, क्योंकि ये पूंजी प्रवाह सीधे तौर पर बाहरी सेक्टर की स्थिरता को प्रभावित करते हैं।
