बाज़ार में आई रौनक, क्यों?
अमेरिका और भारत के बीच लंबे समय से चले आ रहे ट्रेड डिस्प्यूट्स (Trade Disputes) का अंत देर रात हो गया, जिसके बाद आज भारतीय शेयर बाज़ार में ज़बरदस्त उछाल देखने को मिला। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का Sensex 2.54% की बढ़त के साथ 83,739.13 पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का Nifty 50 भी 2.55% चढ़कर 25,727.55 के स्तर पर पहुंच गया। इस तेज़ी से BSE पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप (Market Cap) बढ़कर लगभग ₹467.1 लाख करोड़ (यानी $5.16 ट्रिलियन) हो गया, जो निवेशकों के लिए ₹12.1 लाख करोड़ की नई संपत्ति के बराबर है।
विदेशी निवेशकों (Foreign Portfolio Investors - FPIs) का भरोसा भी बाज़ार में लौटता दिखा। उन्होंने बाज़ार में ₹5,236 करोड़ का पैसा लगाया, जो पिछले साल के बड़े आउटफ्लो (Outflow) के विपरीत एक बड़ा संकेत है। इतना ही नहीं, भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 1% से ज़्यादा मज़बूत हुआ और 90.27 के स्तर के करीब कारोबार कर रहा था, जो पिछले पांच सालों में इसकी सबसे बड़ी एक-दिवसीय बढ़त है। इस डेवलपमेंट (Development) ने बाज़ार की उस सबसे बड़ी चिंता को दूर कर दिया है, जो कई महीनों से निवेशकों के सेंटीमेंट (Sentiment) को दबाए हुए थी।
ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की नई भूमिका
यह ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) भारत की 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) स्ट्रेटेजी (Strategy) को ग्लोबल लेवल पर मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। मल्टीनेशनल कंपनियां (Multinational Companies) अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करके सप्लाई चेन (Supply Chain) को सुरक्षित करने के लिए भारत की ओर देख रही हैं। इस डील के तहत, अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए टैरिफ (Tariff) को 18% तक कम कर दिया गया है, जो पहले 50% तक था। इससे भारतीय एक्सपोर्ट्स (Exports) की अमेरिका में कम्पेटिटिवनेस (Competitiveness) काफी बढ़ जाएगी।
खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS), ऑटो कंपोनेंट्स (Auto Ancillaries), टेक्सटाइल्स (Textiles) और स्पेशियलिटी केमिकल्स (Specialty Chemicals) जैसे सेक्टरों को इस डील का सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। डील से बिज़नेस को एक मज़बूत प्रेडिक्टिबिलिटी (Predictability) मिली है, जिससे कंपनियां टैरिफ के रिस्क (Risk) से निकलकर प्रोडक्शन कैपेसिटी (Production Capacity) बढ़ाने पर ध्यान दे सकती हैं। पिछले साल इसी टैरिफ डिस्प्यूट (Tariff Dispute) की वजह से भारतीय शेयर बाज़ार एशिया के सबसे कमज़ोर परफॉर्म करने वाले मार्केट्स (Markets) में से एक था, ऐसे में इस डील का असर काफी बड़ा है।
आगे क्या?
एक्सपर्ट्स (Experts) का मानना है कि इस ट्रेड एग्रीमेंट और हालिया फिस्कल मेज़र्स (Fiscal Measures) से आने वाले समय में कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) और मैन्युफैक्चरिंग इन्वेस्टमेंट (Manufacturing Investment) के लिए विज़िबिलिटी (Visibility) में काफी सुधार होगा। Reliance Industries, HDFC Bank, ICICI Bank और State Bank of India जैसी बड़ी कंपनियों के शेयर आज की तेज़ी में सबसे आगे रहे, जो ब्रॉड-बेस्ड (Broad-based) इन्वेस्टर ऑप्टिमिज़्म (Optimism) को दर्शाता है।
कई ब्रोकरेजेज़ (Brokerages) ने इन स्टॉक्स पर पॉजिटिव आउटलुक (Outlook) बनाए रखा है। उदाहरण के तौर पर, ICICI Bank के लिए टारगेट प्राइस (Target Price) ₹1750 है, वहीं Reliance Industries को 2028 तक ₹1950, 2029 तक ₹2250 और 2030 तक ₹2600 तक पहुंचने का अनुमान है। Reliance अपने नए एनर्जी (New Energy) और डिजिटल वेंचर्स (Digital Ventures) के ज़रिए लगातार डाइवर्सिफाई (Diversify) कर रही है।
मार्केट वैल्यूएशन (Market Valuation) की बात करें तो Sensex का P/E रेश्यो (Ratio) लगभग 22.5 और Nifty का P/E रेश्यो लगभग 22.4 है। यह दर्शाता है कि मौजूदा तेज़ी मज़बूत तो है, लेकिन वैल्यूएशन्स (Valuations) अभी भी ऐसी रेंज में हैं जो आगे ग्रोथ (Growth) को सपोर्ट कर सकती हैं, बशर्ते अर्निंग्स (Earnings) की उम्मीदें पूरी हों। यह स्ट्रेटेजिक ट्रेड पॉलिसी (Strategic Trade Policy) का री-अलाइनमेंट (Re-alignment) फॉरेन इन्वेस्टमेंट (Foreign Investment) को लगातार बढ़ाने और भारत को एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब (Manufacturing Hub) के तौर पर स्थापित करने में मदद करेगा।