अप्रैल-जून तिमाही में टोल कलेक्शन की ग्रोथ घटकर **4.18%** रह गई, जो कुल **₹21,547.44 करोड़** रहा। टोल ट्रांजैक्शन में **6.6%** की गिरावट मुख्य कारण है, जो कमर्शियल ट्रैफिक और होलसेल इंफ्लेशन में नरमी को दर्शाता है।
क्यों धीमी हुई टोल कलेक्शन की रफ्तार?
वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में नेशनल हाईवे पर टोल कलेक्शन की ग्रोथ में बड़ी नरमी देखी गई। पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में यह ग्रोथ सिर्फ 4.18% रही। इस तिमाही में कुल ₹21,547.44 करोड़ का रेवेन्यू इकट्ठा हुआ, जबकि पिछले साल Q1 FY26 में यह ₹20,681.93 करोड़ था। यह पिछले सालों के डबल-डिजिट ग्रोथ रेट से काफी अलग है, जैसे कि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में 19.6% की सालाना ग्रोथ दर्ज की गई थी।
ट्रांजैक्शन में गिरावट का असर
इस धीमी ग्रोथ का सबसे बड़ा कारण रोड इस्तेमाल में आई कमी है। डेटा के अनुसार, इस तिमाही में टोल ट्रांजैक्शन की कुल संख्या 6.6% घटकर 109.509 करोड़ रह गई, जो पिछले साल इसी अवधि में 117.329 करोड़ थी। भारत में टोल रेवेन्यू का लगभग 75% हिस्सा ट्रकों और ट्रेलर जैसे कमर्शियल वाहनों से आता है। इसलिए, इनके मूवमेंट में मामूली सी गिरावट भी कुल कलेक्शन पर बड़ा असर डालती है।
आर्थिक कारक और महंगाई का लिंक
बाजार के जानकारों और रेटिंग एजेंसियों का मानना है कि यह मंदी किसी लंबी अवधि की मांग की कमी का नतीजा नहीं है, बल्कि यह मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स का असर है। कमर्शियल ट्रैफिक में आई सुस्ती का एक कारण फ्रेट मूवमेंट में नरमी भी है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है। इसके अलावा, नेशनल हाईवे पर टोल रेट हर साल अप्रैल में बदलते हैं, जो आम तौर पर होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में बदलाव से जुड़े होते हैं। पिछले साल WPI इन्फ्लेशन का कम होना टोल रेट्स में मामूली बढ़ोतरी का कारण बना, जिसका सीधा असर इस तिमाही के रेवेन्यू ग्रोथ पर पड़ा।
रिकवरी की उम्मीद
हालांकि, मौजूदा तिमाही में ग्रोथ धीमी रही है, लेकिन साल के बाकी महीनों में स्थिति बदल सकती है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि जुलाई में WPI में आई 10% के करीब बढ़ोतरी आने वाले महीनों में टोल कलेक्शन को बढ़ाने में मदद कर सकती है। टोल प्राइसिंग स्ट्रक्चर में WPI लिंक फैक्टर की बहाली से सेक्टर को रिकवर होने में मदद मिलने की उम्मीद है, क्योंकि पिछले साल के कम इन्फ्लेशन का असर अब खत्म हो रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी कंपनियों पर नजर रखने वाले निवेशक मासिक ट्रैफिक डेटा और फ्रेट इंडेक्स पर नजर रख सकते हैं, ताकि यह पता चल सके कि दूसरी और तीसरी तिमाही में कमर्शियल एक्टिविटी में अपेक्षित उछाल आता है या नहीं।
