निवेशकों में हड़कंप! जियो-पॉलिटिकल टेंशन और कच्चे तेल में आग से भारतीय शेयर बाज़ार धराशायी, Sensex **1690** अंक लुढ़का

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
निवेशकों में हड़कंप! जियो-पॉलिटिकल टेंशन और कच्चे तेल में आग से भारतीय शेयर बाज़ार धराशायी, Sensex **1690** अंक लुढ़का
Overview

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई तूफानी तेजी के कारण शुक्रवार, 27 मार्च 2026 को भारतीय शेयर बाज़ार में भारी गिरावट दर्ज की गई। Sensex **1,690** अंक और Nifty **486** अंक लुढ़क गए।

शुक्रवार, 27 मार्च 2026 को भारतीय शेयर बाज़ार में व्यापक बिकवाली देखने को मिली। BSE Sensex 1,690.23 अंक यानी 2.25% की गिरावट के साथ 73,583.22 पर बंद हुआ। वहीं, Nifty 50 इंडेक्स 486.85 अंक यानी 2.09% गिरकर 22,819.60 पर आ गया। इस बड़ी गिरावट ने निवेशकों की ₹9 लाख करोड़ की दौलत को खत्म कर दिया। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई उछाल इस बिकवाली का मुख्य कारण बनी। तनाव के चलते ऊर्जा आपूर्ति मार्गों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बाधा की आशंकाओं ने कच्चे तेल की कीमतों को $100 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया, जिससे भारत जैसे ऊर्जा-आयात करने वाले देशों में महंगाई बढ़ने की चिंताएँ बढ़ गईं। बैंकिंग, ऑटो और रियल्टी जैसे सेक्टरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखी गई, हालांकि IT सेक्टर कुछ हद तक स्थिर रहा।

यह गिरावट ऐसे समय में आई जब अमेरिकी बाजार, जैसे S&P 500 और Nasdaq भी दबाव में थे, जिससे वैश्विक निवेशकों के बीच 'रिस्क-ऑफ' (Risk-off) सेंटिमेंट साफ दिख रहा था। भारत में बिकवाली का एक बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की ओर से लगातार पूंजी की निकासी रही। मार्च के पहले 20 दिनों में ही FPIs ने ₹88,180 करोड़ से ज्यादा की बिकवाली की, और इस साल की कुल निकासी ₹1 लाख करोड़ के पार जा चुकी है। इस स्थिति को भारतीय रुपये के कमजोर होने से और बल मिला, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94 के स्तर को तोड़कर पहली बार नीचे चला गया। रुपये के कमजोर होने से डॉलर-आधारित संपत्तियां (Dollar Assets) अधिक आकर्षक हो जाती हैं और आयात लागत बढ़ जाती है।

हालांकि, इन चिंताओं के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था के वित्त वर्ष 2026 (FY26) के लिए लगभग 7.6% की मजबूत वृद्धि दर से बढ़ने का अनुमान है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी अपनी मौद्रिक नीति में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है और अगले पांच वर्षों में 4% महंगाई का लक्ष्य रखा है, जो स्थिरता पर RBI के फोकस को दर्शाता है। लेकिन, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई (Imported Inflation) को बढ़ा सकती हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की करीब 85% जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए यह बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील है। कच्चे तेल के बढ़ते दाम चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ा सकते हैं और महंगाई को ऊपर ले जा सकते हैं। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) जैसे विश्लेषकों ने भी भारतीय इक्विटी (Indian Equities) को 'ओवरवेट' (Overweight) से घटाकर 'मार्केट वेट' (Market Weight) कर दिया है, जो बाजार के लिए एक नकारात्मक संकेत है।

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि निकट भविष्य में भू-राजनीतिक घटनाओं और उनके आर्थिक प्रभावों के कारण भारतीय शेयर बाज़ार में उतार-चढ़ाव (Volatility) जारी रहने की उम्मीद है। भले ही भारत एक तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, लेकिन बाहरी कारक इस पर महत्वपूर्ण दबाव डाल रहे हैं। विदेशी निवेशकों का भरोसा तब लौट सकता है जब पश्चिम एशिया में तनाव कम होगा, तेल की कीमतें स्थिर होंगी और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य स्पष्ट होगा। तब तक, निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि विश्लेषक आने वाले समय में कमजोर प्रदर्शन और संभावित गिरावट के जोखिमों की भविष्यवाणी कर रहे हैं।

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