भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों ने बढ़ाई बिकवाली की आग
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी, जो $112 प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली का मुख्य कारण बनी। भारत अपनी 90% से ज्यादा तेल की जरूरतें आयात करता है, ऐसे में तेल की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर देश के इंफ्लेशन (महंगाई), ट्रेड बैलेंस (व्यापार घाटा) और करेंसी (रुपया) को प्रभावित करती हैं। इस अनिश्चित माहौल में FPIs ने मार्च के दूसरे पखवाड़े में ऑटो स्टॉक्स में करीब ₹7,691 करोड़ और रियलटी स्टॉक्स में ₹2,560 करोड़ की बिकवाली की। कंस्ट्रक्शन और कंज्यूमर सर्विसेज सेक्टर में भी भारी बिकवाली देखी गई। सबसे ज्यादा मार फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर पर पड़ी, जहां मार्च महीने में ही FPIs ने अनुमानित ₹60,000 करोड़ के शेयर बेचे, जिससे Nifty Bank इंडेक्स में 17% की गिरावट आई। IT और फाइनेंशियल सर्विसेज से पैसा निकालना भले ही पहले के मुकाबले थोड़ा धीमा हुआ हो, लेकिन यह अभी भी बड़े पैमाने पर जारी है, जो भारतीय इक्विटी से व्यापक दूरी का संकेत देता है।
20 साल में सबसे खराब EM अंडरपरफॉरमेंस और घटती वैल्यूएशन
इस भारी बिकवाली के चलते, भारत के शेयर बाजार ने पिछले 20 सालों में उभरते बाजारों (Emerging Markets - EM) के मुकाबले सबसे खराब प्रदर्शन किया है। फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) में, Nifty 50 इंडेक्स करीब 3-7% गिरा, जबकि MSCI Emerging Markets इंडेक्स 31% उछला। यह 34% का बड़ा अंतर भारत के आम तौर पर ऊंचे वैल्यूएशन को दर्शाता है, जो अब काफी कम हो गया है। एक समय भारत के शेयर, EM साथियों की तुलना में 10 सालों में 73% तक प्रीमियम पर ट्रेड करते थे, लेकिन अब यह गैप घटकर करीब 27% रह गया है। कुछ अनुमानों के अनुसार, भारत का P/E ratio 20.32x है, जबकि EM का औसत 12-18x के बीच है।
EM साथियों से तुलना और सेक्टोरल वैल्यूएशन
इसके बावजूद, भारत के बाजार का वैल्यूएशन अभी भी कई अन्य उभरते बाजारों की तुलना में अधिक बना हुआ है। Nifty 50 का P/E ratio लगभग 20.32x है, जो EM औसत 12-18x से काफी ऊपर है। ऑटो (P/E 23.58x-31.2x) और रियलटी (P/E 32.49x-52.85x) जैसे सेक्टर्स, जहां FPIs ने सबसे ज्यादा बिकवाली की, वे भी ब्रॉडर मार्केट की तुलना में प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। यह लगातार बना हुआ प्रीमियम, बाजार में करेक्शन के बाद भी, भारत को चीन, कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों की तुलना में कम आकर्षक बनाता है, जिन्होंने FY26 में 14.4% से लेकर 113% तक की शानदार बढ़त दर्ज की। MSCI Emerging Markets इंडेक्स में भारत की हिस्सेदारी चौथे स्थान पर आ गई है, जो पहले दूसरे स्थान पर थी।
स्ट्रक्चरल रिस्क और AI ट्रेंड से पिछड़ना
भारत की अर्थव्यवस्था की कुछ अंतर्निहित कमजोरियां भी सामने आई हैं। आयातित तेल पर भारी निर्भरता से लगातार महंगाई और बढ़ते ट्रेड डेफिसिट का खतरा है, जो रुपये पर दबाव डालता है और विदेशी निवेश को हतोत्साहित करता है। हालांकि घरेलू निवेशकों ने बाजार को सहारा दिया है, लेकिन लगातार FPI बिकवाली को झेलने की उनकी क्षमता सीमित है। अन्य उभरते बाजारों के मुकाबले इतना खराब प्रदर्शन, साथ ही ऑटो और रियलटी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में अभी भी ऊंचे वैल्यूएशन, यह संकेत देते हैं कि बाजार शायद उन जोखिमों की आशंका कर रहा है जो अभी पूरी तरह से सामने नहीं आए हैं। इसके अलावा, AI और सेमीकंडक्टर-संचालित बाजारों की ओर बढ़ते वैश्विक निवेश ट्रेंड में भारत पिछड़ रहा है, क्योंकि इसके मुख्य स्टॉक इंडेक्स फाइनेंशियल और IT सेवाओं पर अधिक केंद्रित हैं।
आगे की राह: भू-राजनीतिक तनाव के बीच वोलैटिलिटी की उम्मीद
विश्लेषकों को अल्पावधि में बाजार में वोलैटिलिटी (अस्थिरता) जारी रहने की उम्मीद है। किसी भी स्थिरीकरण के लिए मध्य पूर्व के तनाव का कम होना और तेल की कीमतों का स्थिर होना जरूरी होगा। विदेशी निवेशकों की बिकवाली में थोड़ी सी भी कमी को सकारात्मक रूप से देखा जाएगा। Motilal Oswal Financial Services के अभिषेक सराफ के अनुसार, अगर बिकवाली रुककर खरीदारी शुरू हो जाती है, तो बाजार में तेजी आ सकती है। हालांकि, जब तक कंपनियों के मुनाफे में तेजी से ग्रोथ नहीं होती और विदेशी पूंजी वापस नहीं आती, तब तक एक और साल तक अन्य बाजारों से पिछड़ने की संभावना बनी हुई है। बाजार का मौजूदा वैल्यूएशन, भले ही पहले से कम हो, फिर भी अन्य उभरते बाजारों से ऊपर ट्रेड कर रहा है। इसका मतलब है कि विदेशी निवेशकों की रुचि बनाए रखने के लिए मुनाफे को और तेजी से बढ़ना होगा।