भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा, बाज़ार में घबराहट
मध्य पूर्व में बढ़ती अशांति और भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय शेयर बाज़ार में हाहाकार मचा दिया है। शुक्रवार, 27 मार्च 2026 को, बेंचमार्क इक्विटी इंडेक्स, सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty), में क्रमशः 2.25% और 2.09% की भारी गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट एक ऐसे हफ्ते के बाद आई जब सेंसेक्स 1.27% और निफ्टी 1.28% लुढ़क गया था, जो लगातार पांच हफ्तों की गिरावट को दर्शाता है। इस मंदी का मुख्य कारण पश्चिमी एशिया में जारी संघर्ष है, जिसने ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतों को $110 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है। तेल की कीमतों में इस उछाल का सीधा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि देश तेल का एक बड़ा आयातक है। इससे महंगाई बढ़ने, व्यापार घाटा गहराने और रुपये के कमजोर होने की चिंताएं बढ़ गईं, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.82 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इंडिया VIX इंडेक्स (India VIX Index) में भी खासी बढ़ोतरी देखी गई, जो बाज़ार में व्याप्त घबराहट और अनिश्चितता का संकेत दे रहा है।
विदेशी बनाम घरेलू निवेशक: एक बड़ा अंतर
बाज़ार की चाल पर विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों के बीच का अंतर एक अहम भूमिका निभा रहा है। मार्च 2026 में, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने रिकॉर्ड $12.2 बिलियन (लगभग ₹1.13 लाख करोड़) की निकासी की। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, FPIs मार्च महीने में लगभग हर ट्रेडिंग दिन बिकवाली करते नजर आए, जिन्होंने अब तक ₹88,000 करोड़ से अधिक की रकम निकाली है। वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों, कमजोर होते रुपये और कॉर्पोरेट आय वृद्धि (Earnings Growth) को लेकर चिंताओं को इस बिकवाली का कारण माना जा रहा है। हालांकि, इस भारी बिकवाली को घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने ₹1.28 लाख करोड़ की अब तक की सबसे बड़ी मासिक नेट खरीद के साथ काफी हद तक संभाला है। इस मजबूत घरेलू निवेश ने बाज़ार को बड़ी गिरावट से बचाया है, लेकिन सवाल यह है कि वैश्विक दबावों के बीच यह समर्थन कब तक जारी रहेगा।
Reliance Industries पर निर्यात शुल्क का असर
घरेलू ईंधन आपूर्ति को स्थिर करने के लिए सरकार के एक बड़े कदम ने Reliance Industries के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। 27 मार्च 2026 को, घरेलू उपयोग के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती के साथ, सरकार ने डीजल पर ₹21.5 प्रति लीटर और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर ₹29.5 प्रति लीटर का निर्यात शुल्क (Export Duty) लगा दिया। भारत की सबसे बड़ी ईंधन निर्यातक कंपनी Reliance Industries के शेयर शुक्रवार को 4.55% गिर गए, जो जून 2024 के बाद उनकी सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट थी। इस बिकवाली से कंपनी का बाज़ार मूल्यांकन (Market Value) लगभग ₹88,000 करोड़ घट गया, जिसने सीधे तौर पर सेंसेक्स की गिरावट को और गहरा कर दिया। यह कदम ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने पर सरकार के फोकस को दर्शाता है, भले ही इसका असर निर्यात व्यवसायों पर पड़ रहा हो।
पिछली मंदी बनाम वर्तमान चुनौतियां
हालांकि मौजूदा अस्थिरता गंभीर है, लेकिन इतिहास गवाह है कि भारतीय बाज़ार भू-राजनीतिक झटकों के बाद वापसी करने में सक्षम रहा है। इराक युद्ध और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे पिछले संकटों के बाद बाज़ार में अस्थायी गिरावट आई थी, न कि लंबी मंदी, और कंपनी के मजबूत नतीजों ने अक्सर रिकवरी को गति दी। लेकिन, वर्तमान स्थिति - मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव, FPIs की लगातार बिकवाली, और कमजोर रुपया - एक कहीं अधिक जटिल तस्वीर पेश करती है। हाल के दिनों में, भारतीय शेयर बाज़ार अन्य उभरते बाज़ारों से पिछड़ गया है। निवेशक यहां के मूल्यांकन (Valuations) को अन्य उभरते बाज़ारों की तुलना में महंगा मान रहे हैं, जिससे वे निवेश करने से कतरा रहे हैं। उदाहरण के लिए, Goldman Sachs ने हाल ही में बिगड़ती आर्थिक स्थिति और धीमी लाभ वृद्धि का हवाला देते हुए भारतीय इक्विटी पर अपनी रेटिंग 'Overweight' से घटाकर 'Marketweight' कर दी है।
आगे की राह: जोखिम और उम्मीदें
निकट भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। FPIs की बिकवाली जारी रह सकती है, जिससे रुपये और बाज़ार की नकदी (Liquidity) पर दबाव बढ़ेगा। भारत की तेल आयात पर निर्भरता उसे आर्थिक रूप से संवेदनशील बनाती है; कच्चे तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की वृद्धि से चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) GDP का 0.4-0.5% बढ़ सकता है और GDP वृद्धि 0.5% कम हो सकती है। बाज़ार का मूल्यांकन अभी भी ऊँचा है, और विश्लेषकों ने आय वृद्धि के अनुमानों को कम कर दिया है। घरेलू निवेशक कब तक बाज़ार को सहारा दे पाएंगे, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। निर्यात पर टैक्स जैसे नीतिगत निर्णय भी प्रमुख क्षेत्रों के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं। विश्लेषकों को आने वाले समय में भी अस्थिरता की उम्मीद है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव कम होने और विदेशी निवेशकों के लौटने पर बाज़ार में रिकवरी संभव है। ऊर्जा और रक्षा जैसे क्षेत्रों में अवसर दिख सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर बाज़ार का मूड वैश्विक आर्थिक रुझानों पर निर्भर करेगा। निवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और संस्थागत प्रवाह पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए।