मध्य पूर्व से राहत और कच्चे तेल में नरमी बनी बाज़ार की मुख्य वजह
वैश्विक बाज़ारों से मिले सकारात्मक संकेतों ने भारतीय शेयर बाज़ारों को आज अच्छी शुरुआत दी। बुधवार को ट्रेडिंग के दौरान निफ्टी 50 इंडेक्स 23,100 के पार निकल गया, वहीं BSE सेंसेक्स में 700 से अधिक अंकों की बढ़त दर्ज की गई। इस तेज़ी का मुख्य कारण मध्य पूर्व क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव के कम होने के संकेत और उसके चलते कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतों में आई बड़ी गिरावट है। खबरों के मुताबिक, हॉर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवागमन की उम्मीदों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताओं को कम किया है।
इस भू-राजनीतिक राहत के साथ ही ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में 5% से ज़्यादा की गिरावट आई, जो $98 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। इसी बीच, अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड भी करीब 4.34% तक गिर गया। इस उछाल के पीछे घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) का बड़ा सहारा भी दिखा, जिन्होंने बुधवार को ₹12,033.97 करोड़ के शेयर खरीदे। यह खरीदारी विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की ₹10,414.23 करोड़ की नेट बिकवाली को कुछ हद तक कम करने में मददगार साबित हुई।
FIIs की बिकवाली, रुपया और सेक्टर पर असर
बाज़ार में तेज़ी के बावजूद, विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं। साल 2026 में अब तक FIIs ने भारतीय शेयरों से लगभग ₹1.04 लाख करोड़ निकाले हैं, जिसमें सिर्फ मार्च महीने में ही आधे से ज़्यादा की बिकवाली हुई है। यह लगातार बिकवाली वैश्विक अनिश्चितता और कम वैल्यूएशन पर दक्षिण कोरिया और चीन जैसे बाज़ारों में बेहतर निवेश के अवसरों के चलते मानी जा रही है। ऐसे में, भारतीय रुपये की स्थिरता FIIs के लिए अहम है, जो अभी भी नाजुक बनी हुई है।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी 85% कच्चे तेल की ज़रूरतें आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे बाज़ार पर पड़ता है। Societe Generale और Natixis जैसी ब्रोकरेज फर्मों ने ऊर्जा आयात पर भारत की निर्भरता को लेकर चिंता जताई है। Goldman Sachs का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड में 20% की वृद्धि से क्षेत्रीय कंपनियों के मुनाफे में 2% तक की कमी आ सकती है। इस माहौल में, बड़े शेयरों (Large Caps) की तुलना में मिड कैप और स्मॉल कैप शेयरों में नज़दीकी अवधि में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है, क्योंकि FIIs की बिकवाली का इन पर कम असर पड़ता है।
रैली की स्थिरता पर चिंताएं
फिलहाल, बाज़ार की यह तेज़ी विदेशी संस्थागत निवेशकों के भरोसे से नहीं, बल्कि ट्रेडर्स द्वारा शॉर्ट-कवरिंग (Short-covering) पर अधिक निर्भर लग रही है। मार्च के शुरुआती नौ ट्रेडिंग सत्रों में ही FIIs ने ₹56,883 करोड़ निकाल लिए हैं, जो बाज़ार में आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है। वर्तमान स्तरों पर बाज़ार की स्थिरता रुपये की स्थिरता और FIIs की बिकवाली रुकने पर टिकी है, जो अभी दूर की कौड़ी लग रही है। क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें, हालिया गिरावट के बावजूद, एक बड़ा जोखिम बनी हुई हैं। अगर कीमतें $100 प्रति बैरल पर बनी रहती हैं, तो भारत की GDP ग्रोथ 0.5% तक कम हो सकती है और महंगाई 0.6% तक बढ़ सकती है।
बाज़ार की अगली दिशा
नज़दीकी अवधि में बाज़ार की चाल भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और FIIs के निवेश प्रवाह पर निर्भर करेगी। विश्लेषकों को ऑटो, मेटल और फाइनेंशियल सेक्टर में वापसी की उम्मीद है, लेकिन यह सब वैश्विक स्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी पर निर्भर करेगा। निफ्टी 50 का P/E रेश्यो करीब 20.0 और BSE सेंसेक्स का 19.98-20.4 के आसपास है, जो बताता है कि वैल्यूएशन (Valuations) बहुत ज़्यादा नहीं हैं, लेकिन फंडामेंटल सुधारों के बिना ज़्यादा ऊपर जाने की गुंजाइश सीमित है।