शांति की उम्मीदों से बाज़ार में बहार, पर जोखिम बरकरार
मध्य पूर्व (Middle East) में युद्धविराम (ceasefire) की बढ़ती उम्मीदों ने वैश्विक तेल कीमतों में बड़ी गिरावट ला दी, जिसने सीधे तौर पर भारतीय शेयर बाज़ार को सहारा दिया। 25 मार्च को Brent Crude के दाम $100 प्रति बैरल से नीचे चले गए, जबकि WTI Crude की कीमतें लगभग $87.68 पर आ गईं। इस राहत भरी गिरावट ने भारतीय इक्विटी (equity) को जोरदार मजबूती दी। प्रमुख सूचकांक Nifty 50 ने 23,000 का स्तर पार कर लिया, वहीं BSE Sensex 1,200 से ज़्यादा पॉइंट की छलांग लगाते हुए ऊपर चढ़ा। भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94 के स्तर के करीब आकर स्थिर हुआ, जिससे बाज़ार में एक व्यापक सकारात्मकता (optimism) का माहौल बना।
तेल आयात और चालू खाता घाटे का दबाव
हालांकि, इस तात्कालिक राहत (immediate relief) के बावजूद, भारत अपनी आर्थिक कमजोरियों से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। देश अपनी लगभग 88% कच्चे तेल (crude oil) की ज़रूरतें आयात (import) करता है, जिससे वह वैश्विक ऊर्जा मूल्य झटकों के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील है। चालू खाता घाटा (current account deficit), जो अक्टूबर-दिसंबर 2025 की तिमाही में $13.2 बिलियन तक बढ़ गया था, अभी भी एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है। सेवा निर्यात (service exports) और प्रेषण (remittances) कुछ सहारा दे रहे हैं, लेकिन लगातार ऊंचे तेल की कीमतें भुगतान संतुलन (balance of payments) को बिगाड़ सकती हैं और रुपये को और कमज़ोर कर सकती हैं।
ग्रोथ की मजबूत उम्मीदें, पर भू-राजनीतिक प्रीमियम का खतरा
ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में बड़े झटकों से मुद्रा का अवमूल्यन (currency depreciation) और महंगाई (inflation) में तेज़ी जैसी समस्याएं देखी गई हैं। हालांकि, वर्तमान आर्थिक अनुमान (economic projections) एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। IMF ने भारत के GDP ग्रोथ को FY2026 के लिए 7.3% और World Bank ने 7.2% रहने का अनुमान लगाया है, जो Bernstein की 2-3% की शुरुआती चेतावनियों से कहीं ज़्यादा है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भी महंगाई को FY26 के लिए औसतन 2.1% रहने की उम्मीद कर रहा है, जो Bernstein के डबल-डिजिट महंगाई के अनुमान से बिल्कुल विपरीत है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग के आसपास संघर्ष की संभावना भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risks) को बढ़ाती है। भले ही तनाव कम हो, तेल की कीमतों में एक ऊंचा 'भू-राजनीतिक प्रीमियम' बना रह सकता है। भारत के लिए, इससे महंगाई की चिंताएं फिर से बढ़ सकती हैं, चालू खाता घाटा नियंत्रण से बाहर जा सकता है, और रुपया Bernstein के 98-110 के अनुमानित दायरे की ओर बढ़ सकता है। इन भू-राजनीतिक तनावों के कारण उभरते बाज़ारों (emerging markets) की मुद्राओं में आम तौर पर अस्थिरता बढ़ी है।
हालांकि भारत के आर्थिक विकास के अनुमान मजबूत हैं, लेकिन वे किसी गंभीर, लंबे समय तक चलने वाले बाहरी झटके का पूरी तरह से हिसाब नहीं लगा पाते हैं, जो किसी लम्बे क्षेत्रीय संघर्ष से उत्पन्न हो सकते हैं। Goldman Sachs के विश्लेषकों का मानना है कि नज़दीकी अवधि में आपूर्ति (supply) के कारक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कीमतों में अनिश्चितता बनी रहेगी। बाज़ार मध्य पूर्व के घटनाक्रमों और उनके भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर पर बारीकी से नज़र रखेगा।