India Stocks Rally: मध्य पूर्व के तनाव से राहत, पर तेल की ऊंची कीमतें बनीं बड़ी चुनौती

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India Stocks Rally: मध्य पूर्व के तनाव से राहत, पर तेल की ऊंची कीमतें बनीं बड़ी चुनौती
Overview

मंगलवार को भारतीय शेयर बाज़ारों में ज़बरदस्त उछाल देखा गया, जो फरवरी की शुरुआत के बाद सबसे बड़ी एक दिनी तेज़ी थी। यह तेज़ी मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीदों के चलते आई। हालांकि, ऊंची तेल कीमतों का लगातार बना दबाव बाज़ार के लिए बड़ी चुनौती है, जिससे भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) के बढ़ने और महंगाई में इज़ाफे का खतरा मंडरा रहा है।

मध्य पूर्व के तनाव में कमी से बाज़ारों में आई राहत की लहर

शेयर बाज़ारों में आज एक बड़ी राहत भरी तेज़ी देखने को मिली। उम्मीद की जा रही है कि मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव कम हो सकता है। इसी उम्मीद के सहारे BSE Sensex 1,372 अंकों की बढ़त के साथ 74,069 पर बंद हुआ, जबकि NSE Nifty 400 अंक चढ़कर 22,912 पर रुका। यह दोनों प्रमुख सूचकांकों के लिए 3 फरवरी के बाद का सबसे बड़ा एक दिनी उछाल था। BSE में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (Market Capitalisation) ₹7.6 ट्रिलियन बढ़कर ₹423 ट्रिलियन तक पहुंच गया, जो बाज़ार में चौतरफा खरीदारी का संकेत देता है।

यह तेज़ी कल के गिरावट के बाद आई है, जब दोनों सूचकांक जून और अप्रैल 2024 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर बंद हुए थे। इस तेज़ी का मुख्य कारण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का वह बयान था, जिसमें उन्होंने ईरान के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर तय हमलों को फिलहाल टालने की घोषणा की। इससे तुरंत तौर पर बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की आशंका कम हो गई, जिसने एशियाई बाज़ारों में भी रिकवरी को बढ़ावा दिया।

ऊंची तेल कीमतें: देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा

हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव फिलहाल कम हुआ है, लेकिन Brent क्रूड की कीमतें फिर से $100 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक (Importer) है, लगातार ऊंची तेल कीमतें सीधे तौर पर इंपोर्ट बिल को बढ़ाती हैं। इससे देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ता है और भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर दबाव आता है। 24 मार्च 2026 को रुपया डॉलर के मुकाबले Rs 93.7 के स्तर पर था।

भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट अक्टूबर-दिसंबर 2025-26 तिमाही में बढ़कर $13.2 बिलियन या GDP का 1.3% हो गया था, जो बाहरी झटकों के प्रति देश की भेद्यता (Vulnerability) को दर्शाता है। इसके अलावा, ऊर्जा की बढ़ती लागत से महंगाई भी भड़क सकती है। फरवरी 2026 में महंगाई दर 3.21% थी और तिमाही के अंत तक इसके 3.40% तक पहुंचने का अनुमान है। यह स्थिति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) को लेकर फैसले लेना मुश्किल बना सकती है।

तेल की कीमतों का विभिन्न सेक्टर्स पर असर

खासतौर पर एविएशन (Aviation) सेक्टर, जो काफी हद तक आयातित ईंधन पर निर्भर करता है, इस समय भारी दबाव में है। भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo के शेयर में इस तेज़ी से पहले तेज गिरावट देखी गई थी, क्योंकि ऊंचे फ्यूल कॉस्ट का सीधा असर कंपनी के ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस (Operating Expenses) पर पड़ रहा है। IndiGo का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो लगभग 52.96 है, जो इंडस्ट्री के अन्य कंपनियों और उसके अपने ऐतिहासिक औसत से काफी ऊपर है। विश्लेषकों का मानना है कि Brent क्रूड में $1 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से IndiGo के प्रति शेयर आय (EPS) पर करीब 13% का असर पड़ सकता है, अगर किराए में बढ़ोतरी न की जाए।

दूसरी ओर, Larsen & Toubro का P/E रेश्यो 24-27 के आसपास है, जो इंडस्ट्री नॉर्म्स के अनुरूप है। वहीं, HDFC Bank का P/E रेश्यो 15-21 के बीच है, जो इसे एक सुरक्षित निवेश (Defensive Play) बना सकता है। एनर्जी (Energy) और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) स्टॉक्स ने ऐसे हालातों में उम्मीद के मुताबिक कुछ मजबूती दिखाई है।

अंदरूनी आर्थिक चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं

बाज़ार में आई यह तेज़ी, कुछ गहरी आर्थिक समस्याओं को छिपा सकती है। भारत के तेल आयातक देश होने के नाते, पश्चिम एशिया में किसी भी अस्थिरता का सीधा असर देश के करंट अकाउंट डेफिसिट और मुद्रा के अवमूल्यन (Depreciation) पर पड़ता है। यह दोहरा दबाव महंगाई को बढ़ा सकता है, जिससे RBI को अपनी मॉनेटरी पॉलिसी सख्त रखनी पड़ सकती है।

Foreign Portfolio Investors (FPIs) ने मार्च महीने में ही $11 बिलियन से ज़्यादा की निकासी की है, जो बाज़ार के शॉर्ट-टर्म आउटलुक (Outlook) पर उनका अविश्वास दिखाता है। हाल की गिरावट में Nifty और Midcap इंडेक्स लगभग 9% और 8% गिरे थे। यह दर्शाता है कि हालांकि कुछ नुकसान हुआ है, लेकिन ऊंची तेल कीमतों का महंगाई और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर लगातार असर आगे भी गिरावट का कारण बन सकता है। हालांकि, India VIX (वोलेटिलिटी इंडेक्स) में कमी आई है, जिससे अल्पावधि की चिंताएं घटी हैं, लेकिन लंबी अवधि की आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं।

आगे क्या? सतर्कता ज़रूरी

तत्काल राहत के बावजूद, बाज़ार की भावना (Sentiment) नाजुक बनी हुई है। ब्रोकरेज फर्म Emkay Global Financial Services का अनुमान है कि Nifty में मौजूदा स्तरों से 5% की तेज़ी आ सकती है, लेकिन वे भू-राजनीतिक जोखिमों को स्वीकार करते हैं और उम्मीद करते हैं कि Brent क्रूड $75-80 प्रति बैरल तक गिर सकता है। वे दिसंबर 2026 तक Nifty के लिए 29,000 का लक्ष्य रखते हैं। वहीं, Bajaj Broking के विश्लेषकों का नज़रिया सतर्क है। उनका मानना है कि क्रूड कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण बाज़ार में अस्थिरता (Volatility) बनी रहेगी। लगातार ऊंची तेल कीमतों की संभावना, जो भारत की खपत-आधारित रिकवरी को पटरी से उतार सकती है, एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।

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