भारतीय शेयर बाज़ारों ने शुक्रवार, 10 अप्रैल, 2026 को विदेशी निवेशकों के लगातार पैसा निकालने के बावजूद कमाल की मजबूती दिखाई। ग्लोबल मार्केट से मिले संकेतों और भारत के ऊंचे वैल्यूएशन (valuations) के साथ-साथ भू-राजनीतिक जोखिमों (geopolitical risks) और टैक्स संबंधी चिंताओं के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय बाज़ार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। वे जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और यूरोप जैसे बाज़ारों की ओर रुख कर रहे हैं। एक कमजोर रुपया भी विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर रहा है। इस वजह से, चालू साल 2026 में अब तक ₹2.1 लाख करोड़ से ज़्यादा की रकम का आउटफ्लो (outflow) हो चुका है। हालिया संघर्षों के बाद से तो यह आंकड़ा ₹1.62 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। अप्रैल में अकेले $4.9 बिलियन का आउटफ्लो देखा गया। इसके बावजूद, शुक्रवार को Sensex 0.87% चढ़कर 77,294.95 पर और Nifty1.01% की बढ़त के साथ 24,015.55 पर बंद हुए। Nifty MidCap और SmallCap जैसे अन्य इंडेक्स में भी तेजी देखी गई। यह सब तब हुआ जब विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी थी, जिसकी भरपाई डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) की ज़बरदस्त खरीदारी ने की।
वैश्विक निवेशक अब उन बाज़ारों की तलाश में हैं जहाँ उन्हें कम जोखिम या बेहतर वैल्यू मिले। ताइवान और दक्षिण कोरिया अपनी AI सप्लाई चेन की मजबूती के चलते आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, जबकि भारत को इस मामले में पिछड़ता हुआ माना जा रहा है। वहीं, भारत का टैक्स सिस्टम भी निवेशकों को आकर्षित करने में बाधक बन रहा है। लंबी अवधि और छोटी अवधि के कैपिटल गेन्स पर बढ़ा हुआ टैक्स (12.5% LTCG) और इंडेक्सेशन लाभ (indexation benefits) का खत्म होना, साथ ही बढ़ा हुआ सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) जैसे मुद्दे, विदेशी निवेशकों के लिए आफ्टर-टैक्स रिटर्न (after-tax returns) को कम कर रहे हैं। अमेरिकी डॉलर के नज़रिए से देखें तो, सितंबर 2021 से भारतीय शेयरों से विदेशी निवेशकों को फ्लैट रिटर्न ही मिला है। मार्च 2026 में तो एक ही महीने में रिकॉर्ड ₹1.2 लाख करोड़ का आउटफ्लो देखा गया था। हालांकि, Morgan Stanley जैसे कुछ विश्लेषकों को 2026 के अंत तक Sensex में बड़ी उछाल की उम्मीद है, लेकिन Nomura जैसे अन्य संस्थानों ने ऊंचे ऊर्जा दामों के चलते भारत की रेटिंग डाउनग्रेड की है।
इसके बावजूद, भारतीय बाज़ार के सामने कई बड़े जोखिम मंडरा रहे हैं। भारत अपनी ज़रूरत का करीब 88% तेल आयात करता है, जिससे यह मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति बेहद संवेदनशील है। $96.50 प्रति बैरल के आसपास चल रहे ब्रेंट क्रूड (Brent crude) के दाम इस भू-राजनीतिक जोखिम को दर्शाते हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit), महंगाई (inflation) और रुपये पर दबाव बढ़ा सकती हैं, जिससे रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को मुश्किल फैसले लेने पड़ सकते हैं। वर्ल्ड बैंक (World Bank) और RBI ने भी आगाह किया है कि लगातार ऊंचा तेल मूल्य जीडीपी ग्रोथ को धीमा कर सकता है और महंगाई बढ़ा सकता है, जो भारत की आर्थिक स्थिरता की नाजुकता को दिखाता है। भारत की टैक्स संरचना, जो सुधार के दायरे में है, फिलहाल एशियाई देशों जैसे ताइवान और दक्षिण कोरिया की तुलना में निवेशकों को हतोत्साहित करती है। इसके अलावा, घरेलू इनफ्लो का जारी रहना आर्थिक मजबूती और निवेशकों के भरोसे पर टिका है, जो वैश्विक अनिश्चितता या फिर से भड़कने वाले भू-राजनीतिक तनावों के बीच डगमगा सकता है। एआई (AI) जैसे प्रमुख विकास चालकों की कमी भी विदेशी पूंजी के लिए चिंता का विषय है।
विदेशी पूंजी को वापस आकर्षित करने के लिए भारत को संरचनात्मक समस्याओं को दूर करना होगा। Zerodha के को-फाउंडर Nithin Kamath का सुझाव है कि कैपिटल गेन्स टैक्स नियमों और STT को सरल बनाने से भारत की अपील तेज़ी से बढ़ सकती है। Morgan Stanley और Goldman Sachs के विश्लेषक भारत की दीर्घकालिक संभावनाओं को लेकर आशावादी हैं, जो कंपनी की कमाई में ग्रोथ और सुधाराें पर आधारित है। हालांकि, ये सकारात्मक पूर्वानुमान स्थिर भू-राजनीतिक माहौल और ऊर्जा कीमतों में नरमी पर निर्भर करते हैं। बाज़ार की तेजी को बनाए रखने के लिए, विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और लागत कम करने वाली नीतिगत बदलावों के साथ-साथ घरेलू मांग और संस्थागत समर्थन का जारी रहना महत्वपूर्ण होगा।