बाज़ार में क्यों आई गिरावट?
30 मार्च, 2026 को भारतीय शेयर बाज़ारों ने हफ़्ते की शुरुआत तेज़ गिरावट के साथ की। BSE Sensex 2.22% यानी 1,635.67 अंक लुढ़ककर 71,947.55 पर आ गया, वहीं NSE Nifty 50 2.14% यानी 488.20 अंक की गिरावट के साथ 22,331.40 पर बंद हुआ। इस बड़ी बिकवाली में 2,750 से ज़्यादा शेयर गिरे, जबकि महज़ 73 शेयर ही बढ़त पर रहे। बाज़ार 31 मार्च को छुट्टी के कारण बंद रहा और 1 अप्रैल को खुला। मार्च महीने में Nifty की यह 11% से ज़्यादा की गिरावट मार्च 2020 के बाद सबसे बड़ी मासिक गिरावट थी।
RBI का Forex कैप और बाज़ार पर असर
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए ऑनशोर करेंसी मार्केट में नेट ओपन पोजीशन (Net Open Position) पर $100 मिलियन की नई सीमा तय कर दी है, जो 10 अप्रैल, 2026 से प्रभावी होगी। इस नियम का मकसद सट्टेबाजी पर लगाम लगाना और भारतीय रुपये (Indian Rupee) की गिरती कीमत को संभालना है। 30 मार्च को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड 95.12 के निचले स्तर पर चला गया था, जो ग्लोबल अनिश्चितता और भू-राजनीतिक घटनाओं से और ज़्यादा कमज़ोर हुआ। इस नई पाबंदी से बैंकों को अपनी विदेशी मुद्रा होल्डिंग्स को तुरंत एडजस्ट करना होगा, जिससे अरबों डॉलर की पोजीशन को अनवाइंड (Unwind) करने का दबाव बनेगा और उनके ट्रेजरी ऑपरेशन्स पर असर पड़ेगा।
ग्लोबल टेंशन ने बढ़ाई चिंता
घरेलू बाज़ार की यह गिरावट ऐसे समय में आई जब दुनिया भर में जोखिम लेने की प्रवृत्ति (Risk Aversion) बढ़ रही थी। मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, जिसमें ईरान से जुड़ा संघर्ष भी शामिल है, ने कच्चे तेल की कीमतों को $110 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया। इससे स्टैगफ्लेशन (Stagflation) का डर पैदा हो गया है और निवेशक सुरक्षित संपत्तियों (Safer Assets) की ओर भाग रहे हैं। इसी का असर रहा कि 30 मार्च को एशियाई बाज़ारों में भी गिरावट दिखी, जहां जापान का Nikkei 4.6% और साउथ कोरिया का Kospi 4% से ज़्यादा गिरे। अमेरिका में Nasdaq और Dow Jones जैसे प्रमुख इंडेक्स भी करेक्शन (Correction) ज़ोन में चले गए। इस वैश्विक अस्थिरता के चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने मार्च में भारतीय इक्विटीज़ से करीब $12 बिलियन की भारी निकासी की।
कौन से सेक्टर हुए हिट?
इस बिकवाली का सबसे ज़्यादा असर रेट-सेंसिटिव सेक्टर्स (Rate-Sensitive Sectors) पर पड़ा। बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज इंडेक्स 3.5% और 3.6% से ज़्यादा लुढ़क गए, वहीं PSU बैंकों में 2-4% की गिरावट आई। RBI की फॉरेक्स पॉलिसी और हाई-इंटरेस्ट रेट वाले माहौल में क्रेडिट क्वालिटी को लेकर चिंता ने इन पर दबाव बनाया। ऑटो, FMCG, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, कैपिटल गुड्स, टेलीकॉम और रिएल्टी इंडेक्स भी 2-4% तक गिरे। दूसरी ओर, मेटल्स और ऑयल एंड गैस स्टॉक्स कमोडिटी की मज़बूत कीमतों के सपोर्ट से कुछ हद तक स्थिर रहे।
वैल्यूएशन्स में आई नरमी, पर जोखिम बरकरार
बाज़ार में आई इस भारी गिरावट के बाद अब वैल्यूएशन्स (Valuations) ज़्यादा आकर्षक लग रहे हैं। Nifty का P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) करीब 19 है, जो पिछले 10 सालों के औसत 22.4 से काफी कम है। हालांकि, बाज़ार कैपिटलाइज़ेशन (Market Capitalisation) में $533 बिलियन की भारी कमी आई है, जो बाज़ार की गंभीरता को दर्शाता है।
RBI के इस नए नियम से बैंकों को अपनी पोजीशन अनवाइंड (Unwind) करते समय भारी मार्क-टू-मार्केट (Mark-to-Market) नुकसान उठाना पड़ सकता है। रुपया भी भू-राजनीतिक अस्थिरता और मज़बूत डॉलर के सामने कमज़ोर बना हुआ है। मिड-कैप (Mid-cap) और स्मॉल-कैप (Small-cap) इंडेक्स में 2.5% से ज़्यादा की गिरावट यह दिखाती है कि निवेशक जोखिम भरे एसेट्स से दूर जा रहे हैं।
आगे क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में बाज़ार में वोलैटिलिटी (Volatility) बनी रहेगी, जो भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और RBI के नए फॉरेक्स नियमों के इम्प्लीमेंटेशन (Implementation) पर निर्भर करेगी। हालांकि, कुछ का मानना है कि बैंकिंग सेक्टर में रिस्क-रिवॉर्ड (Risk-Reward) रेशियो बेहतर दिख रहा है। ICICI Bank, State Bank of India और Axis Bank जैसे बैंकों में निवेश की सलाह दी जा रही है। Nifty के लिए 22,000 का लेवल अहम सपोर्ट का काम कर सकता है, जबकि 22,500-22,600 के स्तर पर रेजिस्टेंस (Resistance) मिल सकता है।