तेल की कीमतों में आग, रुपया बेदम: शेयर बाजार में क्यों मची हाहाकार?
गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार में चौतरफा बिकवाली देखने को मिली, जिसका मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज उछाल और भारतीय रुपये का ऐतिहासिक रूप से कमजोर होना रहा। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर भारत की आयात लागत को बढ़ाती हैं, जिससे ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) चौड़ा हो जाता है। इसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है, जो विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजारों को कम आकर्षक बनाता है और वे अपना पैसा निकालकर सुरक्षित ठिकानों की ओर रुख करते हैं।
बाजार में भारी गिरावट, VIX में उछाल
इस स्थिति के चलते, BSE सेंसेक्स 1,100 अंकों से अधिक की गिरावट के साथ 76,400 के स्तर के करीब पहुंच गया। वहीं, निफ्टी 50 भी 350 अंकों से ज्यादा टूटकर 23,900 के नीचे चला गया। दोनों प्रमुख सूचकांक 1.5% से अधिक के नुकसान में रहे। यह बिकवाली केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी भारी गिरावट देखी गई। Nifty Midcap 100 इंडेक्स 1.8% और Nifty Smallcap 100 इंडेक्स 1.1% नीचे आया। बाजार की वोलैटिलिटी (उथल-पुथल) भी बढ़ी, India VIX में करीब 11% का उछाल आया और यह 19.40 पर पहुंच गया, जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता और रुपया क्यों टूटा?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देश के लिए बड़ी चुनौती है। ब्रेंट क्रूड ऑयल का $120 प्रति बैरल से ऊपर कारोबार करना न केवल महंगाई को बढ़ाता है, बल्कि देश के फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटे) को भी चौड़ा करता है। इससे कंपनियों के मुनाफे पर भी दबाव पड़ता है, खासकर ऊर्जा-सघन (energy-intensive) उद्योगों के लिए।
इसके अलावा, भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.35 का अब तक का सबसे निचला स्तर छुआ। रुपये में यह कमजोरी ट्रेड डेफिसिट बढ़ने, उच्च तेल आयात लागत और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) द्वारा बड़ी मात्रा में की जा रही निकासी के चलते आई है। अप्रैल महीने में ही FPIs ने भारतीय बाजारों से $7.8 बिलियन निकाले, और साल की शुरुआत से अब तक यह निकासी $20.5 बिलियन से अधिक हो चुकी है। साथ ही, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड का 4.42% पर बढ़ना भी भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स को कम आकर्षक बना रहा है।
महंगे वैल्यूएशन्स और सेक्टर पर असर
अन्य एशियाई बाजारों में भी कमजोरी के संकेत दिखे। भारतीय शेयर बाजार फिलहाल अपने ऐतिहासिक औसत से ऊंचे वैल्यूएशन्स पर कारोबार कर रहे हैं, जहां Nifty 50 का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो लगभग 24-25 के आसपास है। ऐसे में, नकारात्मक आर्थिक खबरों के लिए बाजार में बहुत कम गुंजाइश बचती है। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के महंगे वैल्यूएशन्स पर, निवेशक बाहरी दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और पूंजी को अन्यत्र ले जाने की संभावना बढ़ जाती है।
अप्रैल-मई 2025 में भी तेल की कीमतों में $115 तक की वृद्धि के बाद निफ्टी में दो हफ्तों में 5% की गिरावट देखी गई थी, जो भारत की कच्चे तेल की कीमतों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है। रियल एस्टेट, ऑटो और मेटल जैसे सेक्टर विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। कुछ विश्लेषक महंगाई और पूंजी प्रवाह के जोखिमों को देखते हुए भारतीय कंपनियों के लिए अपनी अर्निंग फोरकास्ट (कमाई के अनुमान) को कम कर रहे हैं।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि भू-राजनीतिक जोखिमों और लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतों की संभावना को देखते हुए बाजार में वोलैटिलिटी जारी रह सकती है। निवेशक विदेशी पूंजी प्रवाह और आर्थिक आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखेंगे। भारत के शेयर बाजार का प्रदर्शन वैश्विक कमोडिटी कीमतों, करेंसी ट्रेंड्स और अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह से गहराई से जुड़ा रहेगा। यदि वर्तमान दबाव बढ़ता है, तो आगे और गिरावट संभव है। भारत उन अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कईहरे जोखिमों का सामना कर रहा है जिनकी ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम है या जिनकी घरेलू मांग मजबूत है।
