तेल के झटके से शेयर बाजार में दहशत
सोमवार को भारतीय शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी गई। Nifty 50 इंडेक्स लगभग 700 अंक टूटकर 23,900-24,000 के स्तर पर पहुंच गया, जो जनवरी 2026 के अपने रिकॉर्ड हाई 26,373 से 10% के टेक्निकल करेक्शन के करीब था। बीएसई सेंसेक्स भी 1,700 अंक से अधिक की गिरावट के साथ खुला। इस व्यापक बिकवाली ने मिनटों में निवेशकों की ₹12 लाख करोड़ की संपत्ति स्वाहा कर दी। इस गिरावट का मुख्य कारण कच्चे तेल की कीमतों का $115 प्रति बैरल के पार जाना था, जो मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य से सप्लाई बाधित होने के डर से भड़का। इस भू-राजनीतिक तनाव ने ग्लोबल मार्केट को भी झकझोर दिया, जहां डाऊ जोन्स फ्यूचर्स 1,100 अंक से अधिक गिरे और एशियाई बाजारों में भी बड़ी गिरावट आई। इस बीच, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब मंडराता रहा।
अर्थव्यवस्था की नाजुकता आई सामने
भारत की आयात पर 85-90% निर्भरता कच्चे तेल की कीमतों में ऐसे झटकों के प्रति उसे अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। हालांकि भारत ने ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश से जीडीपी के मुकाबले तेल आयात के प्रतिशत को 8.5% से घटाकर 4.8% किया है, लेकिन मुख्य भेद्यता बनी हुई है। विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर $10 प्रति बैरल की वृद्धि भारत की जीडीपी ग्रोथ को लगभग 0.5% कम कर सकती है और करंट अकाउंट डेफिसिट को बढ़ा सकती है। वर्तमान में $115 प्रति बैरल से ऊपर की यह उछाल, जो पिछले कुछ महीनों में 67% से अधिक बढ़ी है, महंगाई को बढ़ावा दे रही है और राष्ट्रीय आयात बिल पर बोझ डाल रही है। इससे रुपये के मूल्य पर सीधा असर पड़ रहा है और मौद्रिक नीति जटिल हो रही है। एविएशन सेक्टर, जो उच्च ईंधन लागत का सामना कर रहा है, और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) जैसे HPCL, BPCL, और IOCL विशेष रूप से प्रभावित हैं। प्रमुख एयरलाइन IndiGo जैसी कंपनियों के लाभप्रदता पर भी इसका असर दिख रहा है।
आगे क्या हैं खतरे?
बाजार में आई इस भारी गिरावट ने आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित नाजुकता को उजागर किया है। कच्चे तेल की कीमतों में यह भारी उछाल भारत पर एक 'मजबूरी का टैक्स' की तरह है, जिससे स्टैगफ्लेशन (उच्च मुद्रास्फीति और धीमी आर्थिक वृद्धि का परिदृश्य) का जोखिम बढ़ गया है। कमजोर होता रुपया आयात लागत को बढ़ाता है और पूंजी के बहिर्वाह (outflow) को शुरू कर सकता है। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 100 के करीब पहुंच रहा है, ऐसे में यह दबाव और चिंताजनक है। बाजार में यह गिरावट, जो आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान के डर से प्रेरित है और $150 प्रति बैरल के संभावित मूल्य लक्ष्यों की ओर इशारा कर रही है, आर्थिक प्रतिकूलताओं के एक लंबे दौर का संकेत दे सकती है। बढ़ती ऊर्जा इनपुट लागत, बढ़ी हुई लॉजिस्टिक्स लागत और मांग में संभावित मंदी से कॉर्पोरेट लाभ मार्जिन खतरे में हैं।
भविष्य का दृष्टिकोण
विश्लेषकों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ काफी प्रभावित हो सकती है, और मुद्रास्फीति आधारभूत अनुमानों से 1.2% से 1.8% तक बढ़ सकती है। Nifty 50 के लिए तत्काल प्रतिरोध 24,500 पर है, जबकि प्रमुख सपोर्ट स्तर 24,000 के आसपास हैं, जो निरंतर अस्थिरता का संकेत देते हैं। ब्रोकरेज फर्मों का दृष्टिकोण सतर्क है, और बाजार का प्रदर्शन मध्य पूर्व संघर्ष की अवधि और कच्चे तेल की कीमतों के स्थिरीकरण पर भारी रूप से निर्भर करेगा। भारतीय रिजर्व बैंक का मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कुछ राहत दे सकता है, लेकिन लगातार बाहरी दबाव घरेलू आर्थिक लचीलेपन की परीक्षा लेगा।