बाज़ार की शुरुआत तो तेज़, पर तेल संकट का साया!
GIFT Nifty से मिले शुरुआती संकेतों के अनुसार, भारतीय इक्विटी बाज़ार 15 अप्रैल, 2026 को तेज़ी के साथ खुल सकता है। हालांकि, इस शुरुआती तेज़ी पर भू-राजनीतिक अस्थिरता और ऊर्जा बाज़ारों पर इसके सीधे असर का साया मंडरा रहा है, जिसने पहले बड़े पैमाने पर बिकवाली को जन्म दिया था। सोमवार, 14 अप्रैल के ट्रेडिंग सेशन में Nifty 50 इंडेक्स में करीब 1% की गिरावट आई और BSE Sensex 700 से ज़्यादा अंक लुढ़क गया, जो नज़दीकी भविष्य के लिए एक सतर्क तस्वीर पेश करता है।
तेल की कीमतों में उछाल और भारत पर असर
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर दिख रहा है। भारत, अपनी 85-88% कच्चा तेल की ज़रूरतें आयात (Import) करता है। ऐसे में, तेल की कीमतों में हर $10 का उछाल, देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को जीडीपी का लगभग 0.5% बढ़ा सकता है और महंगाई में 30 बेसिस पॉइंट की वृद्धि कर सकता है। इस बार ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $94.38 के आसपास हैं, जो एक साल पहले से करीब 43.32% ज़्यादा हैं। कुछ समय पहले तो यह $148 प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर को भी पार कर गया था, जो सप्लाई में तत्काल कमी को दर्शा रहा था।
FIIs की बिकवाली और GDP पर ख़तरा
इस स्थिति का सीधा असर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) पर भी पड़ सकता है, जो पहले से ही मार्च 2026 में INR 772 अरब से ज़्यादा की बिकवाली कर चुके हैं। Nifty 50 का P/E रेश्यो 20.9 और Sensex का 21.1 के आसपास है, जो बढ़ती इनपुट लागतों के कारण कंपनियों के मुनाफे (Profit) को कम कर सकते हैं। S&P ग्लोबल रेटिंग्स के मुताबिक, ऐसे ऊर्जा झटकों के कारण भारत की जीडीपी ग्रोथ वित्त वर्ष 2027 तक घटकर 6.5% रह सकती है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के सामने भी चुनौती है कि वह रुपये को संभालने और महंगाई को काबू करने के लिए क्या कदम उठाए, कहीं ऐसा न हो कि आर्थिक विकास प्रभावित हो।
मध्यम अवधि का नज़रिया...
कुल मिलाकर, भारतीय शेयर बाज़ार के लिए मीडियम-टर्म का नज़रिया, पश्चिम एशिया में तनाव के कम होने और तेल की कीमतों में स्थिरता आने पर निर्भर करेगा। जानकारों का मानना है कि फिलहाल बाज़ार सीमित दायरे में रह सकता है, लेकिन किसी भी तरह की तेज़ी भू-राजनीतिक घटनाओं और तेल की कीमतों के इर्द-गिर्द ही घूमेगी।