Indian Stocks: War Fears Can't Dent Value! Fund Manager's Confidence

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Stocks: War Fears Can't Dent Value! Fund Manager's Confidence
Overview

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण ग्लोबल मार्केट में घबराहट का माहौल है, लेकिन एक टॉप फंड मैनेजर का मानना है कि भारत पर इसका असर सीमित रहने वाला है। देश की तेल आयात पर निर्भरता कम होने के कारण अर्थव्यवस्था पर इसका खास असर नहीं पड़ेगा। कुछ सेक्टर पर तात्कालिक दबाव हो सकता है, लेकिन भारतीय बाजार लंबी अवधि में बड़ा मूल्य (value) पेश कर रहा है और इसमें गिरावट का जोखिम भी सीमित है।

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ग्लोबल मार्केट में युद्ध की आहट से घबराहट

2026 की पहली तिमाही में एसेट प्राइस (asset prices) में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया। ट्रेड डिस्प्यूट्स (trade disputes), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बड़े बदलाव और अब हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बड़े युद्ध के जोखिम ने सब पर असर डाला है। गोल्ड (Gold), सिल्वर (Silver) और बिटकॉइन (Bitcoin) में बड़ी गिरावट आई है, वहीं डाउ (Dow) और निफ्टी (Nifty) जैसे इक्विटी मार्केट (equity markets) भी अपने हालिया हाई (high) से गिरे हैं।

भारत तेल के झटकों से कम क्यों प्रभावित?

3P Investment Managers के फाउंडर और CIO, प्रशांत जैन का मानना है कि अमेरिका/इजराइल-ईरान के मौजूदा संघर्ष का भारत पर असर छोटा और थोड़े समय के लिए ही होगा। यह राय इस बात पर आधारित है कि भारत की तेल आयात पर निर्भरता काफी कम हो गई है। अब यह GDP का सिर्फ 3% है, जो FY2013 में 5% से ज्यादा था। इसके साथ ही, सर्विसेज एक्सपोर्ट (services exports) में मजबूत ग्रोथ के चलते, भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) में कमी आई है और यह लगभग 1% रह गया है। जैन अर्थव्यवस्था के पिछले लचीलेपन (resilience) का भी जिक्र करते हैं। उनका कहना है कि 2000-2008 के बीच, जब तेल की कीमतें $25 से बढ़कर $140 प्रति बैरल हो गईं थीं, तब भी भारत की ग्रोथ 7% सालाना की दर से बढ़ी थी।

सेक्टर पर असर और शेयर बाजार का वैल्यू

ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (oil marketing companies), ऑटो (autos), एयरलाइंस (airlines), रियल एस्टेट (real estate) और सीमेंट (cement) जैसे सेक्टर सीधे तौर पर दबाव में आ सकते हैं। हालांकि, जैन को उम्मीद है कि आईटी (IT), फार्मा (pharmaceuticals) और एफएमसीजी (FMCG) पर बहुत मामूली असर होगा। फर्टिलाइजर (fertilizers), पैकेजिंग (packaging) और कुछ केमिकल कंपनियों (chemical makers) पर ज्यादा दबाव आ सकता है, अगर वे कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत को आगे ग्राहकों पर नहीं डाल पाए। बैंकिंग शेयरों (Banking stocks) को फायदा हो सकता है अगर ब्याज दरें और बढ़ती हैं, बशर्ते लोन की क्वालिटी (loan quality) अच्छी बनी रहे।

इन दबावों के बावजूद, निफ्टी (Nifty) में हालिया गिरावट और 18 महीने के साइडवेज मूवमेंट (sideways movement) ने शेयर वैल्यूएशन (stock valuations) को ज्यादा आकर्षक बना दिया है। इससे कीमतों में और गिरावट का जोखिम सीमित दिखता है। जैन का अनुमान है कि अर्निंग यील्ड (earnings yields) लगभग 14x प्राइस-टू-अर्निंग्स रेशियो (price-to-earnings ratio) के आसपास स्थिर रहनी चाहिए। इसका मतलब है कि बड़ी कंपनियों के शेयरों में अत्यधिक मामलों में 20% तक की गिरावट आ सकती है, जबकि छोटी कंपनियों में यह गिरावट और ज्यादा हो सकती है।

लंबी अवधि का नजरिया: भारतीय बाजार से अच्छे रिटर्न की उम्मीद

मौजूदा मार्केट की उथल-पुथल से परे, मध्यम अवधि के लिए आउटलुक (outlook) पॉजिटिव है। जैन को अगले तीन साल में मौजूदा कीमतों से भारतीय शेयरों से सालाना लगभग 15% रिटर्न की उम्मीद है। यह स्थिति लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अपने शेयर होल्डिंग्स (stock holdings) बढ़ाने का एक अच्छा मौका देती है, बशर्ते यह उनके रिस्क लेने की क्षमता के अनुरूप हो। इस उम्मीद भरे लेकिन सतर्क नजरिए का समर्थन मार्च में विदेशी निवेशकों (foreign investors) की भारी बिकवाली से भी होता है। यह रिकॉर्ड बिकवाली यह संकेत दे सकती है कि कई निवेशकों ने पहले ही अपना प्लान किया हुआ बिकवाल कर लिया है, बजाय इसके कि यह बिकवाली का दबाव जारी रहेगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.