वैश्विक अनिश्चितताओं और मैक्रो इकोनॉमिक दबावों के बीच, भारतीय शेयर बाजारों ने आज 15 मई 2026 को गोता लगाया। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये ने अब तक का सबसे निचला स्तर छुआ, वहीं कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने निवेशकों को सतर्क कर दिया। इन चिंताओं के चलते शेयर बाजारों में मुनाफावसूली (profit-taking) का दबाव देखा गया।
बाजार के मुख्य सूचकांकों की बात करें तो BSE Sensex 160.73 अंक की गिरावट के साथ 75,237.99 पर बंद हुआ, जो 0.21% की कमी है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का Nifty भी 46.10 अंक गिरकर 23,643.50 के स्तर पर पहुंच गया, जो 0.19% की गिरावट दर्शाता है। इस बीच, रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96 का स्तर तोड़कर ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। वहीं, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड $108.8 प्रति बैरल और WTI क्रूड $105 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा था, जिससे आयात लागत बढ़ने की आशंका बढ़ गई।
निवेशकों के रुझान पर नजर डालें तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने ₹1,329 करोड़ की इक्विटी खरीदी, जो बाजार में कुछ उम्मीद जगाता है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने ₹1,958 करोड़ की बिकवाली की, जो स्थानीय स्तर पर सावधानी का संकेत है। सेक्टोरल मोर्चे पर, Realty, PSU Banks, Oil & Gas और Metal जैसे सेक्टर्स में करीब 1.7% से 2% तक की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, IT और FMCG सेक्टर्स ने अच्छा प्रदर्शन किया।
ब्रॉडर मार्केट (Broader Market) में भी नरमी देखी गई। Nifty Midcap 100 में 0.45% और Nifty Small Cap 100 में 0.61% की गिरावट आई। यह दर्शाता है कि निवेशकों का सेंटिमेंट (Sentiment) व्यापक रूप से सतर्क था। वैश्विक बाजारों में भी, एशियाई बाजारों में गिरावट रही और अमेरिकी स्टॉक फ्यूचर्स (Stock Futures) कमजोरी के संकेत दे रहे थे।
भारतीय रुपये की कमजोरी और ऊंचे कच्चे तेल की कीमतें भारत के लिए बड़े आर्थिक जोखिम पैदा करती हैं। भारत अपनी 85% से अधिक कच्चे तेल की जरूरतें आयात करता है, इसलिए बढ़ती तेल कीमतें सीधे तौर पर आयातित महंगाई (Imported Inflation) को बढ़ावा देती हैं। यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर ब्याज दरें ऊंची रखने का दबाव बढ़ा सकता है, जिससे घरेलू खपत प्रभावित हो सकती है। ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) का बढ़ना भी रुपये को और कमजोर कर सकता है। निकट भविष्य में, बाजार की दिशा मुख्य रूप से भू-राजनीतिक घटनाओं, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और RBI की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) पर निर्भर करेगी।