विदेशी निवेशक क्यों बेच रहे हैं शेयर?
साल 2026 के फाइनेंशियल ईयर में विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भारतीय इक्विटी से कुल ₹1.76 लाख करोड़ निकाले हैं। खास बात यह है कि अकेले मार्च 2026 में यह बिकवाली ₹1.22 लाख करोड़ की रही, जो अब तक का सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Bond Yield) में बढ़ोतरी और मिडिल ईस्ट (Middle East) में बढ़ते तनाव को देखते हुए विदेशी निवेशक सतर्क हो गए हैं।
इसके उलट, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने सहारा दिया है। इसी अवधि में DIIs ने ₹8.3 लाख करोड़ का निवेश किया है। इस स्थिति के बावजूद, निफ्टी 50 (Nifty 50) पिछले हफ्ते 22,713.10 के स्तर पर बंद हुआ, जो लगातार छठी साप्ताहिक गिरावट है।
कच्चे तेल का बढ़ता दाम बढ़ा रहा चिंता
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $109 प्रति बैरल को पार कर गई हैं। पिछले एक महीने में इसमें 34% की उछाल आई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए यह स्थिति चिंताजनक है। बढ़ी हुई तेल की कीमतें करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ा सकती हैं, महंगाई को हवा दे सकती हैं और भारतीय रुपये को कमजोर कर सकती हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल से ऊपर बना रहा, तो यह ग्रोथ को धीमा कर सकता है, कीमतों को बढ़ा सकता है और करेंसी पर दबाव डाल सकता है। इससे अगले फाइनेंशियल ईयर के लिए अनुमानित 7.0% से 7.4% जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) पर भी असर पड़ सकता है। बाजार की घबराहट इंडिया VIX (India VIX) में भी दिख रही है, जो जून 2025 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर है।
इकोनॉमी की रफ्तार पड़ रही धीमी
आर्थिक आंकड़े भी विकास की गति धीमी होने के संकेत दे रहे हैं। मार्च में इंडिया के लिए HSBC कंपोजिट PMI (HSBC Composite PMI) घटकर 56.5 पर आ गया, जो अक्टूबर 2022 के बाद सबसे कमजोर विस्तार है। यह गिरावट बढ़ती लागत और कमजोर घरेलू मांग के कारण है। HSBC सर्विसेज PMI (HSBC Services PMI) भी मार्च में 57.2 पर आ गया, जहां नए बिजनेस ग्रोथ में नरमी देखी गई। मैन्युफैक्चरिंग PMI (Manufacturing PMI) मार्च में 53.9 रहा, जो दर्शाता है कि जियोपॉलिटिकल झटकों से अलग भी इकोनॉमी में नरमी आ रही है।
IT सेक्टर पर AI का असर और धीमी ग्रोथ की आशंका
भारतीय IT सेक्टर, जो ग्लोबल टेक डिमांड का एक अहम पैमाना है, अपने मार्च तिमाही के नतीजों का इंतजार कर रहा है। TCS जैसी कंपनियां 1.2% की मामूली रेवेन्यू ग्रोथ की उम्मीद कर रही हैं। हालांकि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से इस सेक्टर में बड़े बदलाव की आशंका है। कुछ एनालिस्ट्स का मानना है कि आने वाले सालों में ट्रेडिशनल IT सर्विसेज रेवेन्यू में 2% से 3% की सालाना कमी आ सकती है। इस वजह से कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल पर फिर से विचार करना होगा। 2026 में अब तक 25% की गिरावट के बावजूद, IT शेयरों के वैल्यूएशन (Valuation) आकर्षक हो गए हैं। TCS करीब 17.89 के P/E रेश्यो पर ट्रेड कर रहा है, जो इसके ऐतिहासिक औसत से कम है। Infosys और अन्य IT कंपनियां भी इसी तरह के P/E रेश्यो (18-19) पर हैं। FY27 के लिए 4-5% की रेवेन्यू ग्रोथ का अनुमान, पिछली डबल-डिजिट ग्रोथ से काफी कम है। बढ़ी हुई अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर भी भारतीय IT स्टॉक्स को कम आकर्षक बना रहे हैं।
मार्केट का आउटलुक: अहम इवेंट्स और बाकी जोखिम
ऐतिहासिक रूप से, मिडिल ईस्ट के संघर्षों से जुड़े तेल की कीमतों में उछाल से भारत की इम्पोर्ट लागत और करेंसी पर असर पड़ा है। हालांकि, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और ऊंची तेल की कीमतें एक मुश्किल परिदृश्य पेश कर रही हैं। करीब 4.32% की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और 100.185 के आसपास का U.S. डॉलर इंडेक्स (U.S. Dollar Index) इमर्जिंग मार्केट एसेट्स को कम आकर्षक बना रहे हैं। भारत की लगभग 90% तेल आयात पर निर्भरता इसे विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। DIIs का इनफ्लो कुछ सहारा दे रहा है, लेकिन यह विदेशी पूंजी की भारी निकासी की भरपाई नहीं कर सकता। 7.0-7.4% की अनुमानित जीडीपी ग्रोथ पर धीमे विकास, बढ़ी हुई कीमतों और कमजोर करेंसी का बड़ा जोखिम है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज PMI में पहले से दिख रही नरमी, मौजूदा जियोपॉलिटिकल घटनाओं से अलग अंतर्निहित दबावों का संकेत देती है। IT सेक्टर के लिए, AI का ट्रेडिशनल रेवेन्यू मॉडल पर असर एक स्ट्रक्चरल शिफ्ट है। TCS के लिए ₹3,135.61 का एवरेज 12-महीने का प्राइस टारगेट वर्तमान अनिश्चितताओं को देखते हुए सीमित अपसाइड दिखा रहा है। आने वाले हफ्ते में IT सेक्टर से कॉर्पोरेट नतीजों और RBI की पॉलिसी (RBI Policy) पर नजर रहेगी, जो करेंसी स्थिरता और ब्याज दरों पर संकेत देंगी। बाजार का सेंटिमेंट मिडिल ईस्ट में डेवलपमेंट, तेल की कीमतों और विदेशी निवेश फ्लो पर निर्भर करेगा।