इस बड़े बदलाव के पीछे की मुख्य वजह लगातार डोमेस्टिक इनफ्लो (Domestic Inflow) हैं, खासकर सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के ज़रिए। इन घरेलू पैसों के लगातार आने से लोकल इन्वेस्टर्स विदेशी बिकवाली को सोखने में कामयाब रहे हैं और बाज़ार को स्थिरता प्रदान कर रहे हैं। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स ने मार्च तिमाही में इक्विटी में कुल $27.2 बिलियन का निवेश किया है।
इसके उलट, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) की ओर से बिकवाली जारी रही। वैश्विक तनावों, जिसमें ईरान संघर्ष भी शामिल है, के कारण मार्च महीने में ही विदेशी निवेशकों ने $14.2 बिलियन बेचे। इससे तिमाही के दौरान FPI आउटफ्लो $15.8 बिलियन तक पहुँच गया, जिससे उनकी कुल हिस्सेदारी ऐतिहासिक निम्न स्तर पर आ गई है।
यह बदलाव सिर्फ ओवरऑल हिस्सेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि सेक्टरों और मार्केट कैप सेगमेंट में भी देखा जा रहा है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशंस ने पिछले एक साल में 24 में से 21 सेक्टरों में अपनी होल्डिंग्स बढ़ाई हैं। प्राइवेट बैंक, टेक्नोलॉजी, टेलीकॉम, रियल एस्टेट, हेल्थकेयर और एनबीएफसी (NBFC) जैसे क्षेत्रों में प्रमुख निवेश देखने को मिला। वहीं, FPIs ने प्राइवेट बैंक, रियल एस्टेट, टेक्नोलॉजी और कंज्यूमर सेग्मेंट्स में बिकवाली की है। यह ट्रेंड लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप सभी तरह के शेयरों में देखा जा रहा है।
खुदरा निवेशकों (Retail Investors) की भागीदारी भी बढ़कर 12.7% हो गई है, जो डोमेस्टिक सपोर्ट को और मज़बूत करती है। इसे एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रक्चरल शिफ्ट माना जा रहा है। हालांकि, डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स बाज़ार को संभालने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन विदेशी फ्लो अभी भी बाज़ार की तेज़ी के लिए ज़रूरी हैं। वैश्विक हालात, खासकर ईरान जैसे मुद्दों पर शांति, विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकती है और बाज़ार में और तेज़ी ला सकती है।
