डोमेस्टिक फंड्स का बढ़ता दबदबा
31 मार्च, 2026 तक, डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स (MFs) के पास नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में लिस्टेड कंपनियों का रिकॉर्ड 11.46% हिस्सा आ गया है। यह लगातार ग्यारहवीं तिमाही है जब MFs की हिस्सेदारी बढ़ी है, जिसका मुख्य कारण सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) के जरिए लगातार आने वाला पैसा है। कुल मिलाकर, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs), जिसमें MFs, बैंक और इंश्योरेंस कंपनियां शामिल हैं, की कुल हिस्सेदारी 19.24% के ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गई। इन डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स ने मार्च 2026 को समाप्त तिमाही में ₹2.51 ट्रिलियन का नेट निवेश किया। यह बढ़ता हुआ डोमेस्टिक कैपिटल बाज़ार के लिए एक स्टेबलाइजिंग फोर्स माना जा रहा है।
विदेशी निवेशकों का पलायन
इसके विपरीत, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) भारतीय शेयरों से पैसा निकालना जारी रखे हुए हैं। 31 मार्च, 2026 तक उनकी मार्केट हिस्सेदारी घटकर 16.13% रह गई, जो 14 साल का निचला स्तर है। इस तिमाही में FIIs ने ₹1.31 ट्रिलियन की निकासी की, जिसमें से ₹1.41 ट्रिलियन सेकेंडरी मार्केट से निकाले गए। इसके पीछे वैश्विक ब्याज दरों में बढ़ोतरी, मजबूत अमेरिकी डॉलर, भू-राजनीतिक तनाव (जैसे अमेरिका-ईरान संघर्ष का कच्चे तेल की कीमतों पर असर) और भारतीय बाज़ार के वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं प्रमुख कारण हैं।
स्वामित्व संरचना में बड़ा बदलाव
भारतीय कंपनियों की स्वामित्व संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। FIIs के अलावा, प्राइवेट प्रमोटर्स की हिस्सेदारी भी नौ साल के निचले स्तर 40.58% पर आ गई है। इसके पीछे प्रमोटर्स द्वारा कर्ज कम करने, फाइनेंशियल प्लानिंग, न्यूनतम शेयरधारिता नियमों को पूरा करने और नए वेंचर्स में पैसा लगाने जैसे कारण रहे। इंडिविजुअल इन्वेस्टर्स (रिटेल और हाई नेट वर्थ इंडिविजुअल्स) की संयुक्त हिस्सेदारी भी पांच साल के निचले स्तर 9.11% पर गिर गई, जिन्होंने तिमाही में नेट ₹13,134 करोड़ के शेयर बेचे।
चिंताएं और बाज़ार का नज़रिया
हालांकि डोमेस्टिक कैपिटल का बढ़ना बाज़ार को स्थिरता देता है, लेकिन MFs पर बहुत अधिक निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। प्रमोटर्स द्वारा लगातार बिकवाली, भले ही कर्ज कम करने के लिए हो, भविष्य की ग्रोथ को लेकर विश्वास की कमी का संकेत भी दे सकती है। भारतीय स्टॉक्स अभी भी कई वैश्विक साथियों की तुलना में प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच चिंता का विषय है। एनालिस्ट्स का मानना है कि 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत तक विदेशी निवेशकों का रुख सकारात्मक हो सकता है, लेकिन प्रवाह मध्यम रह सकता है। SIPs के जरिए डोमेस्टिक इनफ्लो जारी रहने की उम्मीद है।
