बाजार में बढ़त, पर तेल की कीमतों का साया
भारतीय इक्विटी बेंचमार्क (equity benchmarks) ने सोमवार को एक मजबूत रैली दर्ज की। BSE Sensex 787 अंक चढ़कर 74,106.85 पर बंद हुआ, जबकि NSE Nifty 50 ने 255 अंकों की बढ़त के साथ 22,968.25 पर क्लोजिंग दी। गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty) भी करीब 22,975 पर कारोबार कर रहा था। यह मजबूती तब आई जब ग्लोबल क्रूड ऑयल (crude oil) की कीमतें चढ़ गईं। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) $110 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) $113 के आसपास था। ये कीमतें मध्य-2022 के बाद सबसे ऊंची हैं। यह दिखाता है कि बाजार फिलहाल ऊंची ऊर्जा लागतों के आर्थिक असर को नजरअंदाज कर रहा है।
भू-राजनीतिक तनाव से तेल में आग
मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव सीधे तौर पर तेल की कीमतों को भड़का रहा है। अमेरिका द्वारा ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर संभावित हमलों की चेतावनी ने बाजार में जोखिम बढ़ा दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो वैश्विक तेल व्यापार का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यहां कोई बाधा आती है, तो सप्लाई में भारी कमी आ सकती है। उम्मीद है कि तेल की कीमतों में यह अस्थिरता बनी रहेगी और 2026 तक ऊंची बनी रह सकती है, जो संघर्ष की अवधि पर निर्भर करेगा।
भारत पर महंगाई का दोहरा वार
हालांकि एशिया-पैसिफिक के कई बाजारों में मजबूती दिखी, जैसे ऑस्ट्रेलिया का S&P/ASX 200 1.4% और दक्षिण कोरिया का Kospi 1.5% ऊपर था, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था ऊर्जा की कीमतों में इस अचानक उछाल के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% तेल आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर महंगाई को बढ़ाती हैं, चालू खाते के घाटे (current account deficit) को चौड़ा करती हैं, और रुपये पर दबाव डाल सकती हैं।
महंगाई बढ़ने और ग्रोथ घटने का डर
बाजार की सकारात्मक चाल के बावजूद, आर्थिक चुनौतियां गंभीर हैं। भारत की फरवरी CPI इन्फ्लेशन 3.2% थी, लेकिन यह आंकड़ा तेजी से बढ़ सकता है। क्रूड ऑयल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी CPI इन्फ्लेशन में 40-60 बेसिस पॉइंट का इजाफा कर सकती है, जिससे फाइनेंशियल ईयर 2027 तक यह 5% से ऊपर जा सकती है। मूडीज (Moody's) ने पहले ही संघर्ष के प्रभाव को देखते हुए भारत के FY27 GDP ग्रोथ पूर्वानुमान को 6.8% से घटाकर 6% कर दिया है। अन्य अनुमानों के अनुसार, यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो ग्रोथ 6.4-6.5% के आसपास धीमी हो सकती है। चालू खाते का घाटा भी दबाव में है, क्योंकि तेल की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से यह सालाना $18 बिलियन तक बढ़ सकता है। ऐसे समय में भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी कमजोर होता है, जिससे आयात महंगा हो जाता है।
महंगाई का खतरा, पॉलिसी पर चुनौती
ऐतिहासिक रूप से, भारतीय बाजारों ने तेल की कीमतों में बड़े उछाल पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, कभी-कभी तत्काल बिकवाली देखी गई है। हालांकि, मौजूदा स्थिति अधिक जटिल है। मिडिल ईस्ट संघर्ष ने सप्लाई को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं, जिससे तेल की कीमतें भू-राजनीतिक खबरों के प्रति बहुत संवेदनशील हो गई हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (International Energy Agency) ने इसके प्रभावों को 'वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा' बताया है। भारत के लिए, यह इंपोर्टेड इन्फ्लेशन का एक महत्वपूर्ण जोखिम है जो मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) को जटिल बना सकता है। भले ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) 4% महंगाई का लक्ष्य रखता है, लेकिन अनुमान ऊंची संख्याएं दिखा रहे हैं। सरकार का यह रुख कि महंगाई नियंत्रण में है, अगर तेल की कीमतें $100-$110 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो गलत साबित हो सकता है। लंबे समय तक तेल का झटका सब्सिडी लागत के कारण सरकारी खजाने पर भी भारी पड़ सकता है। पिछली अवधियों के विपरीत, जब मजबूत वैश्विक ग्रोथ तेल के झटकों को बेहतर ढंग से अवशोषित कर सकती थी, वर्तमान वैश्विक आर्थिक स्थितियां 'स्टैगफ्लेशन' (stagflation) का जोखिम पैदा करती हैं, जिससे भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाएं अधिक उजागर हो जाती हैं।
आगे का रास्ता: पॉलिसी का मुश्किल संतुलन
भारतीय इक्विटी का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट संघर्ष कितने समय तक चलता है और इसका तेल आपूर्ति पर क्या असर पड़ता है। अल्पकालिक रैलियां संभव हैं, लेकिन अंतर्निहित महंगाई और धीमी आर्थिक ग्रोथ बड़े जोखिम पैदा करते हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को ग्रोथ को सहारा देने और बढ़ती महंगाई से निपटने के बीच एक कठिन संतुलन बनाना पड़ सकता है, जिससे ब्याज दरों में कटौती रुक सकती है या दरें बढ़ भी सकती हैं। निवेशकों को तेल की कीमतों और वैश्विक व भारतीय अधिकारियों के नीतिगत फैसलों पर बारीकी से नजर रखनी होगी ताकि वे इस उभरती हुई आर्थिक स्थिति को समझ सकें।