केंद्रीय सरकार ने वित्तीय वर्ष 2027 की पहली छमाही (H1 FY27) के लिए अपनी उधार योजना का ऐलान कर दिया है, जिसके तहत ₹8.2 लाख करोड़ का भारी भरकम कर्ज़ लिया जाएगा। यह कदम बाजार की बदलती परिस्थितियों और बढ़ती बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) के बीच उठाया गया है, जो सरकार की ऋण प्रबंधन रणनीति का एक अहम हिस्सा है।
उधार की राशि और वित्तीय लक्ष्य
सरकार की योजना के अनुसार, FY27 की पहली छमाही में ₹8.2 लाख करोड़ का उधार लिया जाएगा, जो कि पूरे साल के संशोधित ग्रॉस बोरिंग (Gross Borrowing) लक्ष्य ₹16.09 लाख करोड़ का लगभग 51% है। यह संशोधित वार्षिक आंकड़ा मूल बजट अनुमान ₹17.2 लाख करोड़ से कम है। सरकार का लक्ष्य 2031 तक डेट-टू-जीडीपी रेश्यो (Debt-to-GDP ratio) को 50% तक लाना है, और 2026-27 के लिए कुल देनदारियों को जीडीपी के 55.6% पर लाने का अनुमान है। FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) के जीडीपी के 4.3% रहने की उम्मीद है, जो वित्तीय अनुशासन बनाए रखने का संकेत देता है। इस उधार कैलेंडर को सिक्यूरिटी स्विच और बायबैक जैसे सक्रिय ऋण प्रबंधन उपकरणों के साथ संरेखित किया गया है।
बाजार पर असर और बॉन्ड यील्ड
ऐतिहासिक रूप से, सरकार की बड़ी उधार योजनाएं बॉन्ड यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव डालती रही हैं। पहले ₹17.2 लाख करोड़ के ग्रॉस बोरिंग की घोषणा ने 10-साल के बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड को ऊपर धकेल दिया था। मार्च 2026 के अंत तक, भारत का 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड लगभग 6.93% था। बढ़ी हुई यील्ड सरकार और कॉर्पोरेट दोनों के लिए उधार लेने की लागत को बढ़ाती है, जिससे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मौद्रिक नीति और आर्थिक विकास को समर्थन देने के प्रयासों में जटिलता आ सकती है। बाजार उधार की मात्रा और वैश्विक घटनाओं के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, जिसमें क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें भी यील्ड की अस्थिरता में योगदान कर रही हैं।
ग्रीन बॉन्ड्स और ऋण प्रबंधन
सरकार अपनी ऋण भुगतान प्रोफाइल को अनुकूलित करने और उधार लागत का प्रबंधन करने के लिए सिक्यूरिटी स्विचिंग और बायबैक जैसे ऋण प्रबंधन उपकरणों का उपयोग करना जारी रखेगी। FY27 की उधार योजना का एक प्रमुख हिस्सा सोवरिन ग्रीन बॉन्ड (SGrB) के लिए ₹15,000 करोड़ का आवंटन है। हालांकि भारत की शुरुआत SGrB नीलामी में अच्छी मांग देखी गई थी, लेकिन बाज़ार को 'ग्रीनियम' (Greenium) और तरलता (Liquidity) व जटिलता संबंधी चिंताओं के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसने निवेशकों की रुचि को प्रभावित किया है।
अल्पकालिक ऋण और नकदी प्रवाह
लंबी अवधि के ऋण प्रतिभूतियों के साथ, सरकार ने अप्रैल-जून तिमाही के लिए ट्रेजरी बिल्ज़ (Treasury Bills) के जारी होने का कैलेंडर भी जारी किया है, जिसमें ₹24,000 करोड़ प्रति सप्ताह उधार लिया जाएगा। अल्पकालिक नकदी प्रवाह के अंतर को प्रबंधित करने के लिए, RBI ने FY27 की पहली छमाही के लिए वेज एंड मीन्स एडवांसेज़ (WMA) की सीमा ₹2.5 लाख करोड़ पर बनाए रखी है।
संभावित चुनौतियां और जोखिम
वित्तीय अनुशासन के घोषित लक्ष्यों के बावजूद, राजस्व वृद्धि को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया टैक्स कटौती से राजस्व संग्रह धीमा हो सकता है, जिससे सरकार की वित्तीय लचीलेपन को सीमित किया जा सकता है। FY27 के लिए 55.6% पर अनुमानित उच्च डेट-टू-जीडीपी रेश्यो, प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बना हुआ है।
सरकारी उधार की भारी मात्रा से निजी क्षेत्र के निवेश के लिए उपलब्ध तरलता को अवशोषित करके और व्यवसायों के लिए पूंजी की लागत को संभावित रूप से बढ़ाकर 'क्राउडिंग आउट' (Crowding Out) की चिंताएं भी बढ़ जाती हैं। राज्य सरकारों के बॉन्ड जारी होने से बाजार में कुल ऋण आपूर्ति बढ़ जाती है।
भविष्य का दृष्टिकोण
भारत की क्रेडिट रेटिंग स्थिर बनी हुई है, जिसमें S&P (BBB), Fitch (BBB-) और Moody's (Baa3) जैसी प्रमुख एजेंसियों ने रेटिंग की पुष्टि की है। ये रेटिंग देश की मजबूत वृद्धि, स्वस्थ बाहरी वित्त और राजकोषीय जिम्मेदारी के प्रयासों को दर्शाती हैं। भारत का JP Morgan के GBI-EM और Bloomberg के EM Local Currency Government Index जैसे प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल होना, वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ बढ़ती एकीकरण का संकेत देता है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को आकर्षित करने की उम्मीद है। विश्लेषकों का अनुमान है कि 10-वर्षीय यील्ड निकट अवधि में आपूर्ति दबावों और आर्थिक स्थितियों के प्रति संवेदनशील बनी रहेगी।