महत्वाकांक्षी क्लाइमेट टारगेट्स को मंजूरी
भारत सरकार के कैबिनेट ने देश के जलवायु लक्ष्यों को लेकर बड़ा कदम उठाया है, जिससे वैश्विक स्थिरता की दिशा में मजबूत प्रतिबद्धता साफ दिखाई देती है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश को अपनी लगातार बढ़ती आर्थिक विकास दर को पर्यावरण लक्ष्यों के साथ संतुलित करना है। इन नए लक्ष्यों पर 25 मार्च 2026 को बाजार ने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, जिसमें Nifty 50 और BSE Sensex जैसे प्रमुख सूचकांकों में उछाल देखा गया। इस तेजी का मुख्य कारण भू-राजनीतिक तनाव कम होना और सकारात्मक वैश्विक आर्थिक संकेत थे।
2035 तक क्या होगा हासिल?
आधिकारिक घोषणा के अनुसार, भारत 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता को 47% तक कम करने का लक्ष्य रखेगा। यह लक्ष्य अगले एक दशक में कुल बिजली क्षमता में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी को वर्तमान 52% से बढ़ाकर 60% करने की योजनाओं के साथ मिलकर काम करेगा। यह एक आक्रामक कदम है, जो भारत की पिछली सफलताओं पर आधारित है। उदाहरण के लिए, भारत 2005 और 2020 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में 36% की कमी लाने में पहले ही सफल रहा है। इतना ही नहीं, देश ने 2025 के लिए क्लीन पावर क्षमता का लक्ष्य पांच साल पहले ही हासिल कर लिया था, जिसमें जनवरी 2026 तक गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil fuel) क्षमता कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50% से अधिक हो गई थी। यह भी गौर करने लायक है कि 2025 में भारत के बिजली क्षेत्र के उत्सर्जन में 2.6% की गिरावट आई, जो 2020 के बाद पहली बार हुई है।
वैश्विक परिदृश्य और भारत की राह
भारत का यह नया क्लाइमेट लक्ष्य वैश्विक प्रयासों के बीच आता है। तुलना के लिए, यूरोपीय संघ (EU) का लक्ष्य 2040 तक 1990 के स्तर से ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 90% की शुद्ध कमी लाना है। चीन की योजना 2030 तक कार्बन तीव्रता में लगभग 17% की कमी लाने की है, जो उसके पिछले लक्ष्य से कम है। दूसरी ओर, अमेरिका ने अपनी पिछली नीतियों को काफी हद तक पलट दिया है, हालांकि बाजार की ताकत और राज्य-स्तरीय पहलें नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) को बढ़ावा दे रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) का अनुमान है कि यदि वादों को पूरा किया गया तो अगले दशक में वैश्विक उत्सर्जन कम हो सकता है, पर यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने के लिए काफी नहीं होगा।
सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियां
इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के बावजूद, भारत के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। आर्थिक विकास के साथ-साथ देश का कुल उत्सर्जन (Absolute Emissions) अभी भी बढ़ रहा है, जो आलोचकों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय है। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, स्टोरेज और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर में खरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। एनर्जी स्टोरेज क्षमता एक बड़ी बाधा है; 2035-36 तक 900 GW नवीकरणीय क्षमता के लक्ष्य के लिए 450-900 GWh स्टोरेज की आवश्यकता हो सकती है, जो वर्तमान वैश्विक स्तरों से बहुत अधिक है। जहां भारत का बिजली क्षेत्र स्वच्छ हो रहा है, वहीं कोयला अभी भी ऊर्जा की कुल मांग के लिए महत्वपूर्ण है, और सरकार ऊर्जा सुरक्षा के लिए घरेलू कोयला खनन का विस्तार करने की योजना बना रही है। भारत का कार्बन मार्केट (Carbon Market) भी नए नियमों के साथ बढ़ रहा है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों को चिंता है कि लक्ष्य बहुत नरम हो सकते हैं। अमेरिका का नीतियों से पीछे हटना भी वैश्विक सहयोग को कमजोर कर सकता है।
आगे का रास्ता और निवेश की जरूरत
भारत के सामने दोहरी चुनौती है: तेजी से आर्थिक विकास बनाए रखना और डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) के प्रयासों को गहरा करना। 2026 के लिए, सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार जारी रहने की उम्मीद है, भले ही बढ़ी हुई सोलर मॉड्यूल की कीमतों और विनिर्माण समेकन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़े। कमर्शियल और इंडस्ट्रियल (C&I) सेक्टर नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने में एक महत्वपूर्ण चालक बन रहा है। भारत पेट्रोलियम रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल्स जैसे क्षेत्रों तक नियामक पहुंच का विस्तार करते हुए कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के माध्यम से अपने अनुपालन कार्बन मार्केट का विस्तार भी कर रहा है। अंततः, भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं की सफलता भारी निवेश, तकनीकी और कार्यान्वयन चुनौतियों पर काबू पाने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगी।