भारत और रूस के बीच लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सीधी बिक्री को लेकर बातचीत अपने अंतिम चरण में है। यह डील रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद पहली ऐसी बड़ी LNG डील होगी। हालांकि, इस समझौते पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों (Sanctions) के उल्लंघन का जोखिम मंडरा रहा है। कुछ ही हफ्तों में इस पर अंतिम फैसला आ सकता है।
इस मामले की पुष्टि 19 मार्च को दिल्ली में हुई एक बैठक के दौरान हुई, जिसमें रूस के उप ऊर्जा मंत्री पावेल सोरोकिन और भारत के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी शामिल थे। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब मध्य-पूर्व में ईरान पर हुए हालिया हमलों के कारण प्रमुख शिपिंग लेन बाधित हो गई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा की कीमतें और अधिक अस्थिर हो गई हैं और सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
LNG के अलावा, दोनों देशों ने भारत को कच्चे तेल की बिक्री बढ़ाने पर भी सहमति जताई है। आयात जनवरी के स्तर से दोगुना होकर लगभग एक महीने में भारत की कुल तेल खपत का कम से कम 40% तक पहुंचने की उम्मीद है। यूक्रेन पर आक्रमण के बाद भारत पहले से ही भारी छूट पर रूसी कच्चा तेल खरीद रहा था। भारत सरकार ने संभावित प्रतिबंधों से बचने के लिए वाशिंगटन से एक छूट (waiver) की मांग की है।
पूर्व भारतीय राजदूत अजेय मल्होत्रा के अनुसार, भारत के फैसले उसके राष्ट्रीय हितों और रूस के साथ उसकी पुरानी साझेदारी पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि भारत को अमेरिका के साथ बातचीत में छूट की मांग करनी चाहिए। यह रणनीतिक कदम ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की कार्रवाइयों से हुए व्यवधानों के बाद आया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों से भारत के कच्चे तेल और LNG आयात के लिए सप्लाई में लंबे समय तक व्यवधान की आशंकाएं बढ़ गई हैं, जिससे देश में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें और रसोई गैस की कमी जैसी स्थानीय चिंताएं भी बढ़ी हैं।
रूस इस स्थिति का फायदा उठा रहा है, और किसी भी नई LNG डील में 2012 के गज़प्रोम (Gazprom) के साथ हुए समझौते की तुलना में भारत के लिए कम अनुकूल शर्तें होने की संभावना है, क्योंकि अब यह एक 'विक्रेता बाज़ार' (seller's market) है। इसके अलावा, रूसी संस्थाएं भारत के दूरदराज के इलाकों में बिजली पारेषण (power transmission) बुनियादी ढांचे पर सहयोग और हवाई संपर्क बढ़ाने की भी योजना बना रही हैं।
इस गहरे होते आर्थिक रिश्ते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि द्विपक्षीय व्यापार का 96% अब रुपये और रूबल में हो रहा है। ये लेन-देन तेजी से हो सकते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच वित्तीय प्रवाह सुगम होता है।