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स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) को डोमेस्टिक सेल्स की इजाज़त, पर शर्तें भारी! इंडिया में बिकेंगे गुड्स, पर ये लिमिट्स जान लीजिए

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) को डोमेस्टिक सेल्स की इजाज़त, पर शर्तें भारी! इंडिया में बिकेंगे गुड्स, पर ये लिमिट्स जान लीजिए
Overview

वित्त मंत्रालय ने स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) की कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए उन्हें **1 अप्रैल 2026** से **1 साल** के लिए डोमेस्टिक मार्केट (DTA) में **5% से 12.5%** की कंसेशनल ड्यूटी पर सामान बेचने की इजाज़त दी है। हालांकि, इस राहत पर **30% एक्सपोर्ट वैल्यू कैप** और कुछ अन्य कड़ी शर्तों ने इसके दायरे को सीमित कर दिया है।

पॉलिसी में बड़ा बदलाव और सरकार का इरादा

यह कदम SEZ पॉलिसी में एक अहम बदलाव दिखाता है, जो अब सिर्फ एक्सपोर्ट पर ही फोकस नहीं करेगी। सरकार चाहती है कि Special Economic Zones (SEZs) इंडिया के बढ़ते डोमेस्टिक मार्केट का फायदा उठा सकें और अपनी खाली पड़ी क्षमता का इस्तेमाल कर सकें। खास तौर पर ग्लोबल ट्रेड में अनिश्चितता के इस दौर में, यह एक नई राह खोलता है।

डोमेस्टिक सेल्स पॉलिसी की खास बातें

सरकार की नोटिफिकेशन के मुताबिक, यह पॉलिसी 1 अप्रैल 2026 से एक साल के लिए लागू होगी। इसके तहत, योग्य SEZ मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स अपने गुड्स को डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (DTA) में 5% से 12.5% के बीच कस्टम ड्यूटी पर बेच सकेंगी। यह सामान्य कस्टम ड्यूटी से काफी कम है जो आमतौर पर SEZ के सामान पर लगती है। यह पहल इंडस्ट्री की मांग को पूरा करने और ग्लोबल ट्रेड डिसरप्शन से निपटने के लिए है। इसका मकसद कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बढ़ाना, एक्सपोर्ट कॉस्ट कम करना और डोमेस्टिक प्रोडक्शन व जॉब्स को बढ़ावा देना है। हालांकि, इस बिक्री की मात्रा एक बड़ी शर्त के साथ जोड़ी गई है: यह यूनिट की पिछले 3 सालों की सबसे ज़्यादा एनुअल एक्सपोर्ट वैल्यू (FOB) के 30% तक ही सीमित रहेगी। यह लिमिट यह सुनिश्चित करने के लिए है कि एक्सपोर्ट ही मुख्य फोकस बना रहे।

इंडस्ट्री का क्या है कहना?

भारत के Special Economic Zones (SEZs) एक्सपोर्ट में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। 2025-26 (दिसंबर 2025 तक) में इनका ओवरसीज सेल्स ₹11.70 लाख करोड़ से ज़्यादा रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 32.02% की बढ़ोतरी है। फरवरी 2026 तक 368 नोटिफाइड SEZs के साथ, ये ज़ोन एक महत्वपूर्ण इंडस्ट्रियल बेस हैं। आमतौर पर, भारत में इंपोर्ट पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) 0% से 100% तक लग सकती है, साथ ही IGST, सोशल वेलफेयर सरचार्ज और अन्य ड्यूटीज़ भी। SEZs को डोमेस्टिक सेल्स के लिए 5-12.5% की कंसेशनल रेट एक बड़ा इंसेंटिव है। यह एक बड़ा बदलाव है क्योंकि पहले SEZs से डोमेस्टिक सेल्स पर फुल कस्टम ड्यूटी लगती थी। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स इसे एक पॉजिटिव कदम मान रहे हैं, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव, टेक्सटाइल और लेदर जैसे सेक्टर्स के लिए, जो डोमेस्टिक मार्केट में हाई इंपोर्ट ड्यूटी और ग्लोबल ट्रेड चैलेंजेज का सामना कर रहे हैं। यह कदम 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने और इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने के सरकारी लक्ष्य के अनुरूप भी है।

प्रमुख सीमाएं और रुकावटें

इतनी राहत के बावजूद, इस पॉलिसी की प्रभावशीलता कई कड़ी शर्तों के कारण बहुत सीमित है। सबसे बड़ी रुकावट यह है कि डोमेस्टिक सेल्स के लिए तैयार किए गए गुड्स के इनपुट्स पर किसी भी तरह के ड्यूटी ड्रॉबैक (Duty Drawback) या फॉरेन ट्रेड पॉलिसी (Foreign Trade Policy) के तहत मिलने वाले एक्सपोर्ट इंसेंटिव का फायदा नहीं उठाया जा सकेगा। कई SEZ यूनिट्स, जो कम मार्जिन पर काम करती हैं, कच्चे माल पर इंपोर्ट ड्यूटी की भरपाई के लिए ड्यूटी ड्रॉबैक स्कीम्स पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती हैं। इन फायदों को छोड़ने का मतलब है कि डोमेस्टिक सेल्स का प्लान कई यूनिट्स के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है। इसके अलावा, यह पॉलिसी सिर्फ एक बार के लिए है और डोमेस्टिक सेल्स की लिमिट 30% FOB वैल्यू कैप पर है। इससे साफ है कि यह पॉलिसी शायद बड़े मार्केट एक्सेस के बजाय सिर्फ इन्वेंटरी क्लियर करने या कुछ खास प्रोडक्ट्स को बेचने का सीमित ज़रिया बनेगी। साथ ही, 31 मार्च 2025 तक प्रोडक्शन शुरू करने वाली और कम से कम 20% वैल्यू एडिशन दिखाने वाली यूनिट्स ही इसके लिए योग्य होंगी, जिससे नई या कम विकसित यूनिट्स बाहर रह जाएंगी। फ्री ट्रेड एंड वेयरहाउसिंग ज़ोन (FTWZ) और 'एज़-इज' (as-is) गुड्स को इससे बाहर रखा गया है, जिससे पॉलिसी का दायरा और सिकुड़ गया है।

आगे की राह: गाइडलाइंस और सुधार

इस पॉलिसी की असली सफलता सरकार द्वारा अगले कुछ महीनों में जारी की जाने वाली विस्तृत गाइडलाइंस पर निर्भर करेगी। इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स विभिन्न सेक्टर्स के लिए स्पेसिफिक ड्यूटी रेट्स, FOB वैल्यू लिमिट की गणना कैसे होगी, और 'एक्सपोर्ट बेनिफिट्स नॉट अवेल्ड' (export benefits not availed) जैसी बातों पर स्पष्टता का इंतज़ार कर रहे हैं। यह कदम फ्लेक्सिबिलिटी की ओर एक कदम तो है, लेकिन इसका वन-टाइम नेचर और रिस्ट्रिक्टिव शर्तें कई SEZ यूनिट्स को और भी स्थायी और व्यापक सुधारों की मांग करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। जैसे कि, रॉ मटेरियल कॉस्ट के आधार पर 'ड्यूटी-फोरगोन' (duty-foregone) सिस्टम, ताकि वे डोमेस्टिक मार्केट का पूरा फायदा उठा सकें। इसका लॉन्ग-टर्म असर इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या यह सीमित उपाय एक ऐसी स्ट्रक्चरल पॉलिसी में बदल पाता है जो SEZ और डोमेस्टिक इंडस्ट्री के हितों में संतुलन बनाते हुए भारत की ओवरऑल एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस को बढ़ा सके।

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