कमेटी का काम और इंडस्ट्री की मांग
17 सदस्य वाली इस कमेटी का काम छह महीने के अंदर 'SEZ 2.0' के लिए एक प्लान तैयार करना है। इसका मुख्य फोकस SEZs को दूसरे एक्सपोर्ट प्रोग्राम के साथ मिलाने और सरकार के खर्चों का आकलन करना है। SEZ कंपनियां लंबे समय से डोमेस्टिक मार्केट में 'ड्यूटी-फॉरगोन' (duty-foregone) आधार पर सामान बेचने की परमानेंट इजाजत मांग रही हैं। उनका कहना है कि 2026-27 के यूनियन बजट में मिली एक बार की छूट पर्याप्त नहीं है। इंडस्ट्री कच्चे माल की लागत पर ड्यूटी लगाना चाहती है, न कि फाइनल प्रोडक्ट पर, जिससे टैक्स का बोझ कम हो।
ग्लोबल ट्रेड का दबाव और रिफॉर्म्स की जरूरत
ग्लोबल इकोनॉमिक शिफ्ट और ट्रेड डिस्प्यूट्स, खासकर अमेरिका के टैरिफ, SEZ रिफॉर्म की जरूरत को बढ़ा रहे हैं। सरकार का हालिया कदम, जिसमें SEZs को कम ड्यूटी पर डोमेस्टिक गुड्स बेचने की इजाजत दी गई, वह अमेरिका के टैरिफ के जवाब में था। अमेरिका के टैरिफ ने भारतीय एक्सपोर्ट को नुकसान पहुंचाया है और कुछ सेक्टरों में ऑर्डर कैंसल हुए हैं। SEZs को लोकल मार्केट का फायदा उठाने की इजाजत से वे ग्लोबल डिमांड और प्रोटेक्शनिज्म से बच सकते हैं। लेकिन, परमानेंट पॉलिसी बदलाव की जगह अस्थायी समाधान अपनाने से भारत वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से पिछड़ रहा है।
फिस्कल कंसर्न और बदलते फायदे
SEZs एक्सपोर्ट और इन्वेस्टमेंट बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन सरकार के फाइनेंस पर उनका असर चिंता का विषय रहा है। स्टडीज बताती हैं कि SEZs के कारण टैक्स ब्रेक और ड्यूटी छूट से काफी रेवेन्यू लॉस होता है। इंडस्ट्री का 'ड्यूटी-फॉरगोन' मॉडल रेवेन्यू के मुद्दों को बढ़ा सकता है, अगर इसे ठीक से मैनेज न किया जाए। 2005 में एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग ज़ोन (EPZs) से SEZs में बदलाव के बाद से, SEZ व्यवस्था बेहतर फिस्कल और रेगुलेटरी शर्तें प्रदान करने का लक्ष्य रखती है। हालांकि, SEZs के लिए कुछ टैक्स फायदे, जैसे MAT और डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स (Dividend Distribution Tax) को वापस लेने से, नॉर्मल डोमेस्टिक मार्केट में बेचना कुछ कंपनियों के लिए कम आकर्षक हो गया है, जिससे नए SEZs का बनना धीमा हो गया है।
धीमी रफ्तार पर आलोचना और आगे का रास्ता
आलोचक SEZ रिफॉर्म्स की धीमी रफ्तार और उनके फिस्कल कॉस्ट पर सवाल उठाते हैं। SEZ इंसेटिव्स से होने वाला रेवेन्यू लॉस पॉलिसीमेकर्स को चिंतित करता है। इंडस्ट्री की परमानेंट 'ड्यूटी-फॉरगोन' डोमेस्टिक सेल्स की मांग, कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाने के इरादे से, इन फिस्कल दबावों को बढ़ा सकती है। यह सवाल भी बना हुआ है कि SEZs कितनी प्रभावी ढंग से नौकरियां पैदा कर रहे हैं, खासकर मैन्युफैक्चरिंग में, क्योंकि वे ज्यादातर सर्विसेज सेक्टर को फायदा पहुंचा रहे हैं। रिफॉर्म्स लागू करने में लगातार देरी, जिसमें DESH Bill जैसे पिछले प्रयास भी शामिल हैं, इंडस्ट्री को निराश कर रही है। सरकार का यह सतर्क रवैया महत्वपूर्ण बदलावों में देरी कर सकता है, जिससे प्रतिस्पर्धियों को फायदा मिल सकता है। वर्तमान कमेटी 'SEZ 2.0' पॉलिसी पर काम कर रही है, जो शायद एक आधुनिक और एकीकृत सिस्टम बनाए। एक्सपेक्टेड रिफॉर्म्स SEZs को अन्य एक्सपोर्ट प्रोग्राम के साथ अलाइन करेंगे और ग्लोबल इकोनॉमिक शिफ्ट्स के बीच उन्हें और आकर्षक बनाएंगे। आखिरकार, इन रिफॉर्म्स की सफलता कमेटी की सिफारिशों और सरकार कितनी जल्दी उन्हें प्रभावी पॉलिसी में बदल पाती है, इस पर निर्भर करेगी।