चांदी के आयात पर सरकारी नकेल
भारत सरकार ने कीमती धातुओं के बाज़ार में अपनी दखलंदाज़ी तेज कर दी है। अब चांदी के दाने (grains) और पाउडर (powders) को भी प्रतिबंधित आयात की सूची में डाल दिया गया है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) के ज़रिए लागू की गई इस नई नीति के तहत, आयातकों को देश में माल लाने से पहले विशेष अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यह कदम मई के मध्य में आई उस नई गाइडलाइन के बाद उठाया गया है, जिसने उच्च शुद्धता वाली चांदी की सिल्लियों (bars) और अर्ध-निर्मित उत्पादों को भी इसी श्रेणी में रखा था। इस तरह, देश में आने वाली 90% से अधिक चांदी के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।
मैक्रोइकोनॉमिक वजहें
यह सख्त रेगुलेटरी रवैया चालू खाता (Current Account) के बढ़ते दबाव का सीधा जवाब है। 31 मार्च 2026 को समाप्त हुए फाइनेंशियल ईयर में, भारत ने चांदी के आयात पर रिकॉर्ड $12 अरब डॉलर खर्च किए, जो पिछले साल के $4.8 अरब डॉलर की तुलना में काफी ज़्यादा है। नीति निर्माता इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि गैर-ज़रूरी कीमती धातुओं के आयात पर खर्च होने वाला हर डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ाता है। यह दबाव वैश्विक कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और लगातार मजबूत होते डॉलर के चलते पहले से ही बना हुआ है। "फ्री" से "रिस्ट्रिक्टेड" (Restricted) श्रेणी में आयात व्यवस्था को बदलकर, सरकार सट्टा-आधारित मांग को नियंत्रित करना चाहती है, साथ ही औद्योगिक सप्लाई चेन पर भी नज़र रखना चाहती है।
बारीकियों का विश्लेषण: आर्बिट्रेज और प्रीमियम
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इन प्रतिबंधों का मुख्य उद्देश्य उन खामियों को दूर करना है जो मई की शुरुआत में कस्टम ड्यूटी में 6% से बढ़ाकर 15% करने के बाद सामने आई थीं। टैक्स में इस भारी बढ़ोतरी के बाद, खासकर उन देशों के ज़रिए आयात को लेकर एक बड़ा गैप बन गया था जिनके साथ भारत के तरजीही व्यापार समझौते (preferential trade agreements) हैं। व्यापारी इस अंतर का फायदा उठाकर ज़्यादा टैक्स से बच रहे थे। इसी को रोकने के लिए सरकार ने आयात लाइसेंसिंग को सख्त कर दिया है। घरेलू बाज़ार में, इसका नतीजा अंतरराष्ट्रीय COMEX कीमतों और स्थानीय MCX दरों के बीच अंतर के रूप में सामने आया है। जैसे-जैसे भौतिक रूप से चांदी की सप्लाई हासिल करना मुश्किल हो रहा है, भारतीय आयातक धातु तक पहुंचने के लिए ज़्यादा प्रीमियम चुका रहे हैं, जिससे चांदी पर निर्भर सेक्टरों में महंगाई बढ़ रही है।
मज़बूत गिरावट की आशंका: स्ट्रक्चरल कमज़ोरियां
हालांकि सरकार रुपये को बचाने की कोशिश कर रही है, लेकिन इन नीतियों से डाउनस्ट्रीम इंडस्ट्रीज़ के लिए बड़े जोखिम पैदा हो गए हैं। भारत के सौर ऊर्जा (solar energy), इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) जैसे सेक्टर हाई-कंडक्टिविटी कंपोनेंट्स के लिए आयातित चांदी पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं। सोने के विपरीत, जिसका ज़्यादातर इस्तेमाल निवेश और गहनों में होता है, चांदी एक महत्वपूर्ण औद्योगिक इनपुट है। अगर लाइसेंसिंग प्रक्रिया अपारदर्शी या नौकरशाही वाली बनी रहती है, तो घरेलू निर्माताओं को सप्लाई की कमी या इनपुट लागत में भारी वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है। इससे वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता कमज़ोर होगी। इसके अलावा, सोने के बाज़ार में हस्तक्षेप के पिछले अनुभव (जैसे 2013 का 80:20 नियम) बताते हैं कि अत्यधिक सख्त नियम अक्सर व्यापार को समानांतर अर्थव्यवस्था (parallel economy) की ओर धकेलते हैं, जिससे मांग वास्तव में कम होने के बजाय तस्करी और ग्रे-मार्केट गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
भविष्य का नज़रिया
इंडस्ट्री के विश्लेषकों को उम्मीद है कि नई लाइसेंसिंग ज़रूरतों के बीच घरेलू चांदी का बाज़ार अस्थिर बना रहेगा। बाज़ार प्रतिभागियों को MCX-LBMA प्राइस स्प्रेड (price spread) पर बारीकी से नज़र रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह अंतर सप्लाई में रुकावट की गंभीरता का सबसे सटीक बैरोमीटर साबित होगा। चूंकि सरकार की वर्तमान प्राथमिकता औद्योगिक सुविधा के बजाय मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता बनाए रखना है, इसलिए निकट भविष्य में नीति में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद कम है। जब तक वैश्विक ऊर्जा कीमतों का दबाव कम नहीं होता, तब तक चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को प्रबंधित करने पर ही ध्यान केंद्रित रहेगा।
