देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से घटकर सिर्फ **26%** रह गया है। यह सामान्य स्तर से काफी कम है और 13 राज्यों में पानी की किल्लत खेती, पीने के पानी और बिजली उत्पादन के लिए खतरा पैदा कर सकती है। करीब **44%** जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है।
क्या हुआ?
सेंट्रल वॉटर कमीशन (CWC) के 2 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में 47.725 अरब क्यूबिक मीटर पानी है। यह क्षमता का केवल 26% है। वर्तमान जल स्तर पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 61% और पिछले दस साल के औसत से 1.4% कम है। मानसून की धीमी और असमान शुरुआत के कारण यह बड़ी जल संकट की स्थिति पैदा हो गई है।
खेती और बिजली उत्पादन पर असर
पानी की यह कमी सीधे तौर पर खेती और बिजली उत्पादन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। खरीफ फसलों के लिए सिंचाई पूरी तरह से जलाशयों पर निर्भर करती है। जल स्तर में भारी गिरावट से राज्यों को खेती के लिए पानी मुहैया कराने में दिक्कत होगी, जिससे फसल की पैदावार कम हो सकती है।
इसके अलावा, बिजली बनाने वाले हाइड्रो पावर प्लांट भी लगातार पानी के बहाव पर निर्भर करते हैं। कृष्णा और कावेरी जैसी नदियों के बेसिन में पानी कम होने से इन पावर प्लांट की क्षमता सीमित हो गई है। ऐसे में, कोयले से चलने वाले थर्मल पावर पर निर्भरता बढ़ सकती है।
किन राज्यों में ज्यादा संकट?
जल संकट खासकर कुछ राज्यों में गंभीर है। कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा और झारखंड में जल स्तर पिछले दस सालों के औसत से काफी नीचे है। महाराष्ट्र के भीमा-उज्जैनी और तमिलनाडु के अलियार जैसे कुछ जलाशयों में पानी लगभग शून्य हो गया है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, देश के 44% जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है, जबकि 22% जिलों में गंभीर कमी है। बारिश की यह व्यापक कमी पानी के बंटवारे को मुश्किल बना रही है।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
निवेशकों के लिए, यह जल संकट कई सेक्टर्स के लिए एक छिपा हुआ जोखिम है। पानी की कमी से फसल उत्पादन प्रभावित होने पर कृषि, फर्टिलाइजर और FMCG कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि किसानों की आय कम होने से ग्रामीण मांग घट जाती है।
साथ ही, जिन औद्योगिक कंपनियों को अपने उत्पादन में ज्यादा पानी की जरूरत होती है, उन्हें भी पानी की सप्लाई में रुकावट का सामना करना पड़ सकता है, अगर सरकार पीने और सिंचाई को प्राथमिकता देती है। निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि लंबे समय तक जलाशयों में पानी का कम स्तर कंपनियों की लागत बढ़ा सकता है और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर, सबसे महत्वपूर्ण है अगले कुछ हफ्तों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रगति पर नजर रखना। इन जलाशयों को भरने के लिए लगातार और व्यापक बारिश की जरूरत है। निवेशकों को CWC की साप्ताहिक रिपोर्ट में जल भंडारण प्रतिशत में सुधार देखना चाहिए और कर्नाटक व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सरकार की जल प्रबंधन नीतियों पर नजर रखनी चाहिए। इसके अलावा, जरूरी सामानों की कीमतों पर नजर रखने से भी कृषि संकट के कारण सप्लाई चेन में तनाव के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं।
