देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर पिछले साल के मुकाबले 39% तक गिर गया है। भले ही मॉनसून की बारिश हो रही है, लेकिन जलाशयों में पानी की क्षमता अभी केवल 34.5% बची है। इस पानी की कमी से खरीफ फसलों की पैदावार, बिजली उत्पादन और ग्रामीण इलाकों में पानी की सप्लाई पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने का भी खतरा है।
Detailed Coverage
भारत के जलाशयों में पानी की गंभीर कमी
सेंट्रल वॉटर कमीशन (Central Water Commission) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 16 जुलाई तक भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार घटकर 63.25 बिलियन क्यूबिक मीटर रह गया है। यह पिछले साल इसी अवधि के मुकाबले 39.2% की भारी गिरावट है। मॉनसून आने के बावजूद, इन जलाशयों में पानी की मात्रा पिछले साल 2025 की इसी अवधि में दर्ज 103.96 बिलियन क्यूबिक मीटर से काफी कम है। वर्तमान में, इन महत्वपूर्ण जलाशयों की कुल क्षमता का केवल 34.5% ही भर पाया है।
खेती और बिजली उत्पादन पर असर
जलाशयों में पानी की यह कमी कृषि क्षेत्र पर भारी पड़ रही है, खासकर धान, गन्ना और कपास जैसी पानी पर निर्भर फसलों के लिए। खरीफ सीजन भारत के सालाना खाद्य उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा है, और अगर पानी की कमी जारी रहती है, तो पैदावार पर बुरा असर पड़ेगा और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं। कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture and Farmers Welfare) के आंकड़ों के अनुसार, 17 जुलाई तक खरीफ की बुवाई 65.8 मिलियन हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल की इसी अवधि से 4.2 मिलियन हेक्टेयर कम है। किसानों द्वारा पानी की अनिश्चित उपलब्धता को देखते हुए यह सावधानी बरती जा रही है।
ऊर्जा उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। जलाशयों के जल स्तर पर बहुत अधिक निर्भर जलविद्युत उत्पादन (Hydropower generation) जून में पिछले साल की तुलना में 19.5% गिर गया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर बारिश का पैटर्न नहीं सुधरा, तो पूरे साल जलविद्युत उत्पादन 9% से 10% तक गिर सकता है। ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ने वाला यह दबाव उन क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता पर व्यापक असर डाल सकता है जो बड़े पैमाने पर जलविद्युत पर निर्भर हैं।
देश भर में बारिश का असंतुलन
पानी की इस कमी का मुख्य कारण देश भर में मॉनसून की असमान बारिश है। इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (India Meteorological Department) के अनुसार, 1 जून से 15 जुलाई के बीच देश में कुल 23% कम बारिश हुई है। पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे गंभीर स्थिति है, जहाँ 36% की कमी दर्ज की गई है। इसके बाद दक्षिणी प्रायद्वीप में 26% और उत्तर-पश्चिम भारत में 19% की कमी आई है। नतीजतन, दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों में जलाशयों का जलस्तर अपनी क्षमता का केवल 28.4% और 28.5% ही भर पाया है।
हालांकि मॉनसून का मौसम सितंबर तक जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन वर्तमान स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। रबी सीजन की बुवाई और कुल खाद्य उत्पादन पर इसका अंतिम प्रभाव मॉनसून समाप्त होने तक अनिश्चित बना रहेगा। निवेशक और नीति निर्माता आने वाले हफ्तों में जलाशयों के जल स्तर और बारिश के वितरण पर कड़ी नज़र रखेंगे ताकि महंगाई और ग्रामीण मांग पर संभावित जोखिमों का आकलन किया जा सके।
