देशभर में पानी का संकट गहराता जा रहा है। भारत के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर पिछले साल के मुकाबले **36%** तक गिर गया है, जिसकी मुख्य वजह इस साल मॉनसून का **15%** कम रहना है। यह स्थिति खासकर दक्षिण भारत में गंभीर है, जहाँ जलाशयों में केवल **30%** क्षमता तक ही पानी बचा है। इस पानी की कमी से बिजली उत्पादन, सिंचाई और औद्योगिक उत्पादन पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जिससे इन सेक्टरों और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर बुरा असर पड़ सकता है।
Detailed Coverage
मॉनसून की मार, जलाशय खाली
भारत इस वक्त गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission) के अनुसार, 23 जुलाई तक 166 प्रमुख जलाशयों में 70.432 अरब क्यूबिक मीटर (Billion Cubic Metres) पानी बचा था, जो उनकी कुल क्षमता का महज़ 38.37% है। यह आंकड़ा पिछले साल इसी अवधि के मुकाबले 36% कम है और पिछले एक दशक के औसत से भी नीचे है।
बेमौसम मॉनसून का कहर
पानी की यह कमी मुख्यतः मॉनसून के असमान वितरण का नतीजा है। 1 जून से 25 जुलाई तक देश में 15% की बारिश की कमी दर्ज की गई। हालांकि जुलाई के तीसरे हफ्ते में मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में कुछ राहत मिली, लेकिन दक्षिण प्रायद्वीप (South Peninsular) क्षेत्र में 26% की लगातार कमी बनी हुई है। इस असमान पैटर्न के कारण कई महत्वपूर्ण कैचमेंट एरिया (Catchment Areas) में जलाशयों को भरने लायक पानी नहीं पहुँच पाया है।
दक्षिण भारत पर सबसे ज़्यादा असर
फिलहाल दक्षिण भारत इस संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित है। इस क्षेत्र के 47 बड़े जलाशयों में पानी का स्तर अपनी सामान्य क्षमता 44.18% की तुलना में घटकर महज़ 30.26% रह गया है। खासकर तेलंगाना में, जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से 57% तक कम है। कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य भी पानी की भारी कमी से जूझ रहे हैं।
उद्योगों और खेती पर खतरा
इस जल संकट का असर कई सेक्टरों पर पड़ रहा है। हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर (Hydroelectric Power) का उत्पादन, जो जलाशयों के पानी पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है, मुश्किल में पड़ सकता है। इसके अलावा, पानी का ज़्यादा इस्तेमाल करने वाले उद्योग जैसे टेक्सटाइल प्रोसेसिंग (Textile Processing), पेपर मैन्युफैक्चरिंग (Paper Manufacturing) और थर्मल पावर प्लांट (Thermal Power Plants) को बढ़ती लागत या सीमित सप्लाई का सामना करना पड़ सकता है। सबसे ज़्यादा जोखिम में कृषि क्षेत्र है, क्योंकि सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम होने से प्रभावित इलाकों में फसल चक्र खतरे में पड़ सकता है।
