भारत की स्थापित रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जून 2026 तक 162.15 GW तक पहुँच गई है, जो पिछले एक दशक में एक महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाती है। हालाँकि, अल नीनो के कारण मॉनसून की बारिश सामान्य से 21% कम रहने से देश को कृषि चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
Detailed Coverage
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी में शानदार प्रदर्शन
भारत ने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में जबरदस्त तरक्की की है। 30 जून 2026 तक, देश की कुल स्थापित रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता बढ़कर 162.15 गीगावाट (GW) हो गई है। यह 2013-14 के 2.82 GW के आँकड़े से एक बड़ी छलांग है, जो स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर भारत की नीतिगत बदलाव को साफ दिखाता है। इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, इस प्रगति के साथ भारत कुल स्थापित सोलर क्षमता में दुनिया में तीसरे स्थान पर आ गया है।
मॉनसून की मार और कृषि क्षेत्र पर असर
जहाँ एक ओर रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में तेजी है, वहीं दूसरी ओर कृषि क्षेत्र मौसम की अनिश्चितता से जूझ रहा है। 14 जुलाई 2026 तक, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन की कुल बारिश सामान्य औसत से 21% कम रही। सरकार का कहना है कि इसका एक कारण अल नीनो की स्थिति है, जो अक्सर बारिश के पैटर्न को बिगाड़ देती है। इन जोखिमों को कम करने के लिए, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय किसानों को 130 फील्ड यूनिट्स और मौसम (Mausam) व मेघदूत (Meghdoot) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से मौसम-आधारित कृषि सलाह दे रहा है।
जलवायु और इंफ्रास्ट्रक्चर का हाल
विदर्भ, दक्षिणी उत्तर प्रदेश और उत्तरी मध्य प्रदेश सहित कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने के बावजूद, भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बताया कि 2026 में देश ने ऐतिहासिक रुझानों की तुलना में असामान्य रूप से गंभीर हीटवेव का अनुभव नहीं किया। ये उच्च तापमान गर्मी के महीनों के लिए अपेक्षित सीमा के भीतर ही रहे। सरकार भूकम्पीय गतिविधियों पर भी नजर रख रही है, खासकर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा-चंबा क्षेत्र में, जहाँ जून 2026 में 16 भूकंप दर्ज किए गए थे।
निवेशकों और हितधारकों के लिए, मॉनसून की सामान्य से कम बारिश का कृषि उपज और ग्रामीण उपभोग पैटर्न पर पड़ने वाला प्रभाव एक महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु बना रहेगा। शुरुआती मौसमी बारिश के पूर्वानुमान को सामान्य औसत के 90% तक संशोधित करने के साथ, यह क्षेत्र संभावित अस्थिरता का सामना कर रहा है। अब इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा कि नमी का स्तर फसल उत्पादन और आने वाली तिमाहियों में कृषि इनपुट की मांग को कैसे प्रभावित करता है।
