RBI डिप्टी गवर्नर का भरोसा: रेमिटेंस प्रवाह पर उम्मीदें
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने साफ कर दिया है कि देश में आने वाले रेमिटेंस (प्रेषण) को लेकर चिंता की जरूरत नहीं है। उन्होंने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के असर को कमतर आंकते हुए कहा कि भारतीय प्रवासी अब अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जिससे प्रेषण को मजबूती मिलती है। गुप्ता के मुताबिक, पश्चिम एशिया से आने वाले रेमिटेंस का हिस्सा घटकर करीब 40% रह गया है, जबकि बाकी प्रवासी अब IT, हॉस्पिटैलिटी, हेल्थ, एजुकेशन और कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टर में काम कर रहे हैं। यह भौगोलिक और सेक्टरल विविधीकरण (diversification) प्रेषण को क्षेत्रीय झटकों से बचाता है। उन्होंने भारत की मुख्य आर्थिक ताकतों, जैसे कि मजबूत सर्विसेज एक्सपोर्ट और फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) इनफ्लो को भी बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) के लिए अहम बताया।
बढ़ता आर्थिक दबाव: जब हकीकत सामने आई
हालांकि, डिप्टी गवर्नर के इस आशावादी रुख के विपरीत, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.34 पर पहुंच गया है। यह गिरावट पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के साथ मेल खा रही है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) भी भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं। 2026 की शुरुआत के पहले चार महीनों में ही $20.2 अरब से अधिक का FPI आउटफ्लो देखा गया है। यह बड़ा पूंजी बहिर्वाह, $119 अरब के 2025-26 के ट्रेड डेफिसिट के साथ मिलकर, अर्थव्यवस्था की बाहरी कमजोरियों को उजागर करता है, जिन्हें अकेले रेमिटेंस पूरी तरह से नहीं पाटा जा सकता।
वैश्विक परिदृश्य और भारत की निर्भरता
भारत दुनिया में रेमिटेंस पाने वाला सबसे बड़ा देश है। 2026 में भारत को $137.67 अरब रेमिटेंस मिलने की उम्मीद है, जो इसके ट्रेड डेफिसिट को कम करने में बड़ी भूमिका निभाता है। हालांकि, निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए रेमिटेंस की वैश्विक वृद्धि धीमी पड़ रही है, जो 2024 में 3% रहने का अनुमान है। मेक्सिको और फिलीपींस जैसे देश भी रेमिटेंस पर काफी निर्भर हैं।
भू-राजनीतिक तनाव और तेल की मार
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनावों ने सीधे तौर पर ऊर्जा की कीमतों को भड़काया है। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जो भारत के लिए एक बड़ा जोखिम है, क्योंकि यह अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है। तेल की बढ़ी हुई कीमतें सीधे तौर पर ट्रेड डेफिसिट को बढ़ाती हैं और रुपये को कमजोर करती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के अंत तक रुपया 94-96 प्रति डॉलर के बीच रह सकता है, जबकि कुछ इसे 86-88 तक मजबूत होने की उम्मीद कर रहे हैं। इस करेंसी की अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं ने FPIs की बिकवाली को और तेज कर दिया है।
FPI आउटफ्लो का भारी बोझ
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 के पहले चार महीनों में $1.92 ट्रिलियन का FPI आउटफ्लो हुआ, जो 2025 के पूरे साल के $1.66 ट्रिलियन आउटफ्लो से कहीं ज्यादा है। यह विदेशी निवेशकों के बीच 'रिस्क-ऑफ' सेंटिमेंट को दर्शाता है। इतना बड़ा पूंजी बहिर्वाह, हाल के महीनों में नकारात्मक नेट FDI के साथ मिलकर, भारत के BoP डेफिसिट को फाइनेंस करने में एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है।
आर्थिक ताकतों पर सवाल
आलोचकों का तर्क है कि डिप्टी गवर्नर गुप्ता का भारत की 'स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ्स' पर भरोसा, लगातार बनी हुई मैक्रोइकॉनॉमिक कमजोरियों को नजरअंदाज कर रहा है। रेमिटेंस एक स्थिर प्रवाह प्रदान करते हैं, लेकिन वे BoP का केवल एक हिस्सा हैं। भारत को अपने करंट अकाउंट में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक डेफिसिट का सामना करना पड़ रहा है, जिसके 2026 में $37 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। 2025-26 में $119 अरब के व्यापार घाटे से यह और बढ़ जाता है। FPIs का बड़ा पलायन, विशेष रूप से वैश्विक जोखिम से बचाव और अमेरिकी टेक स्टॉक्स की अपील के बीच, भारत की बाहरी वित्तपोषण स्थिरता में विश्वास की कमी का संकेत देता है। विकसित देशों के विपरीत, भारत का BoP काफी हद तक पूंजी प्रवाह पर निर्भर करता है, जो हाल ही में धीमा और उलट गया है। नेट FDI पिछले दो वर्षों में औसतन $1 अरब प्रति वर्ष से भी कम रहा है। RBI की रुपये को समर्थन देने की क्षमता उसके विदेशी मुद्रा भंडार और लगातार बिकवाली के दबाव से सीमित है।
रुपये के लिए मिली-जुली भविष्यवाणी
2026 के लिए भारतीय रुपये को लेकर विश्लेषकों की राय बंटी हुई है। कुछ संस्थाएं, जैसे बैंक ऑफ अमेरिका और ING, अमेरिकी डॉलर में अपेक्षित कमजोरी और भारत की विकास संभावनाओं का हवाला देते हुए 86-88 INR प्रति डॉलर तक मामूली मजबूती की भविष्यवाणी कर रही हैं। हालांकि, एक अधिक आम राय रुपये पर लगातार दबाव की उम्मीद कर रही है। UBS और DBS बैंक इसे 94 प्रति डॉलर की ओर कमजोर होने की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि Barclays और IDFC फर्स्ट बैंक पूंजी प्रवाह और बाहरी दबावों से जुड़ी चल रही चुनौतियों का हवाला देते हुए 95-96 के स्तर का अनुमान लगा रहे हैं। RBI का खुद का 94 प्रति डॉलर का अनुमान इन आर्थिक चुनौतियों को स्वीकार करता है।
