अर्थव्यवस्था के पैमाने में बड़ा बदलाव
अब तक देश के Gross Domestic Product (GDP) को मापने का पैमाना 2011-12 का था, लेकिन अब इसे नया आधार वर्ष 2022-23 दिया गया है। यह सिर्फ नंबर बदलने की बात नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था की मौजूदा हकीकत को सटीक ढंग से दर्शाने के लिए एक अहम कदम है। पुराना 2011-12 का बेंचमार्क (benchmark) अब समय के साथ पीछे छूट गया था और यह पिछले एक दशक में उभरे नए सेक्टर्स (sectors) जैसे डिजिटल और गिग इकोनॉमी (gig economy) को ठीक से नहीं दिखा पा रहा था। IMF ने भी पहले भारत के राष्ट्रीय खातों (national accounts) को 'C' रेटिंग दी थी, जो इस बड़े बदलाव की जरूरत को साफ दिखाता है।
नई तकनीकें और डेटा का इस्तेमाल
इस नए GDP सीरीज में कई खास बातें शामिल की गई हैं। सबसे बड़ा बदलाव है 'डबल डिफ्लेशन' (double deflation) तकनीक का इस्तेमाल, खासकर मैन्युफैक्चरिंग (manufacturing) और एग्रीकल्चर (agriculture) जैसे सेक्टर्स में। यह तकनीक आउटपुट (output) और इनपुट (input) कीमतों को अलग-अलग एडजस्ट (adjust) करके असली वैल्यू-एडेड (value-added) को ज्यादा सटीकता से मापती है। इससे कमोडिटी (commodity) की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कम होता है। साथ ही, अब Goods and Services Tax (GST) का डेटा प्राइवेट कॉर्पोरेट सेक्टर के आउटपुट का अनुमान लगाने में अहम भूमिका निभाएगा। इसके अलावा, e-Vahan, FASTag और PFMS जैसे पोर्टल्स का डेटा सड़क परिवहन, लॉजिस्टिक्स (logistics) और सरकारी खर्चों पर नजर रखने में मदद करेगा। GDP डिफ्लेटर बास्केट (GDP deflator basket) में आइटम्स (items) की संख्या 180 से बढ़ाकर करीब 600 कर दी गई है, ताकि महंगाई के बदलावों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
वैश्विक मानकों के करीब और ऐतिहासिक संदर्भ
यह पूरा बदलाव भारत को अंतर्राष्ट्रीय मानकों, खासकर System of National Accounts (SNA) 2008 के करीब लाता है। भारत में GDP बेस ईयर बदलने का यह कोई नया कदम नहीं है; पहले भी 1999, 2006 और 2015 में ऐसे बदलाव किए गए हैं। हर बार का मकसद अर्थव्यवस्था में हुए संरचनात्मक बदलावों को शामिल करना रहा है। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि Wholesale Price Index (WPI) का बेस ईयर अभी भी 2011-12 ही है, जो कुछ इकोनॉमिस्ट्स (economists) के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
विश्लेषकों की राय और भविष्य का अनुमान
नए आंकड़ों के अनुसार, सरकार FY2025-26 के लिए 7.6% की रियल GDP ग्रोथ (real GDP growth) का अनुमान लगा रही है, जो पहले के 7.4% से थोड़ा ज्यादा है। अक्टूबर-दिसंबर 2025 तिमाही में ग्रोथ 7.8% रही, जो उम्मीदों से बेहतर है। हालांकि, इस रीकैलिब्रेशन (recalibration) से पिछले कुछ फाइनेंशियल ईयर (financial years) के लिए नॉमिनल GDP (nominal GDP) का आकार थोड़ा कम हुआ है। इसका मतलब है कि फिस्कल डेफिसिट-टू-GDP रेशियो (fiscal deficit-to-GDP ratio) उम्मीद से थोड़ा ज्यादा रह सकता है।
संभावित जोखिम और चुनौतियां
इस नए GDP डेटा के कई अहम पहलू हैं जिन पर नजर रखनी होगी। नॉमिनल GDP के कम होने से फिस्कल डेफिसिट-टू-GDP रेशियो पर 15-20 बेसिस पॉइंट (basis points) तक का असर पड़ सकता है। गिग इकोनॉमी (gig economy) और अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) को मापना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, क्योंकि इन सेक्टर्स में आय और स्थिरता का अभाव है। WPI का बेस ईयर 2011-12 पर ही अटकना GDP डेटा से तालमेल बिठाने में दिक्कत पैदा कर सकता है। नए डेटा से हो सकता है कि कुछ सेक्टर्स की धीमी ग्रोथ या संरचनात्मक कमजोरियां पहले से ज्यादा स्पष्ट हो जाएं, जिस पर निवेशकों और नीति निर्माताओं को बारीकी से ध्यान देना होगा।